टाइगर स्टेट में ‘दहशत’: दो बाघों की संदिग्ध मौत के बाद जागा वन महकमा, तराई पूर्वी वन प्रभाग में हाई अलर्ट; लेकिन सवाल है कि हमेशा पानी सिर से ऊपर गुजरने के बाद ही क्यों खुलती है प्रशासन की नींद?

टाइगर स्टेट में 'दहशत': दो बाघों की संदिग्ध मौत के बाद जागा वन महकमा, तराई पूर्वी वन प्रभाग में हाई अलर्ट; लेकिन सवाल है कि हमेशा पानी सिर से ऊपर गुजरने के बाद ही क्यों खुलती है प्रशासन की नींद?
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टाइगर स्टेट में ‘दहशत’: दो बाघों की संदिग्ध मौत के बाद जागा वन महकमा, तराई पूर्वी वन प्रभाग में हाई अलर्ट; लेकिन सवाल है कि हमेशा पानी सिर से ऊपर गुजरने के बाद ही क्यों खुलती है प्रशासन की नींद?

 

उत्तराखंड के जंगलों से एक बेहद परेशान और झकझोर देने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे सूबे के वन महकमे की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। हरिद्वार वन प्रभाग और राजाजी टाइगर रिजर्व की श्यामपुर रेंज में हाल ही में दो बाघों की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने पूरे प्रदेश के वन महकमे में हड़कंप मचा दिया है। इस दोहरी मौत के बाद आनन-फानन में पूरे राज्य में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। इसी कड़ी में उत्तराखंड के सबसे बड़े, घने और बेहद संवेदनशील माने जाने वाले तराई पूर्वी वन प्रभाग (हल्द्वानी) के प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) हिमांशु बागरी ने एक आपातकालीन समीक्षा बैठक बुलाई और डिवीजन के सभी रेंज अधिकारियों के पेंच कसते हुए पूरे क्षेत्र में तत्काल प्रभाव से अलर्ट लागू कर दिया है।
वन्यजीवों के लिहाज से समृद्ध इस तराई के जंगल में अब वन कर्मियों को 24 घंटे फील्ड में एक्टिव रहने के कड़े निर्देश दिए गए हैं, संवेदनशील इलाकों और संदिग्ध रास्तों पर भारी संख्या में कैमरा ट्रैप लगाए जा रहे हैं, और मुख्य बैरियरों पर हर आने-जाने वाले वाहन की सघन चेकिंग शुरू कर दी गई है। लेकिन वन विभाग की यह मुस्तैदी और 24 घंटे की गश्त कागजों पर और बयानों में जितनी कड़क दिख रही है, जमीनी हकीकत पर उतने ही गंभीर और तीखे सवाल खड़े करती है कि आखिर हमेशा कोई बड़ा हादसा होने के बाद ही वन विभाग की नींद क्यों जागती है। दो शानदार बाघों की संदिग्ध मौत हो जाने के बाद ही आपात बैठकें और हाई अलर्ट की याद क्यों आती है, और क्या वन्यजीवों की सुरक्षा सिर्फ किसी हादसे के बाद की ‘रस्म अदायगी’ बनकर रह गई है।
तराई का यह पूरा बेल्ट शिकारियों और अंतरराष्ट्रीय तस्करों के रडार पर हमेशा रहता है, यह बात किसी से छुपी नहीं है, तो फिर जंगलों के प्रवेश द्वारों और मुख्य बैरियरों पर यह सघन चेकिंग और लंबी दूरी की गश्त पहले से ही रूटीन का हिस्सा क्यों नहीं थी। जब विभाग को अच्छी तरह पता है कि ये इलाके संवेदनशील हैं, तो संदिग्ध रास्तों पर कैमरा ट्रैप लगाने के लिए बाघों की मौत का इंतजार क्यों किया गया, क्या वन विभाग की यह ढिलाई और सुस्ती सीधे तौर पर शिकारियों को खुला निमंत्रण नहीं है। यह बेहद गंभीर विषय है क्योंकि अगर समय रहते केवल डैमेज कंट्रोल और कागजी अलर्ट जारी करने के बजाय धरातल पर खुफिया तंत्र को हमेशा के लिए मजबूत नहीं किया गया, तो उत्तराखंड के गौरव कहे जाने वाले इन बाघों का अस्तित्व पूरी तरह खतरे में पड़ जाएगा, इसलिए अब वन महकमे को अपनी इस लचर कार्यप्रणाली को सुधारना होगा ताकि भविष्य में किसी और बेगुनाह वन्यजीव को अपनी जान न गंवानी पड़े।

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