फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, निचली अदालतों को दिए बड़े निर्देश
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मौत की सजा से जुड़े मामलों में अहम और सख्त दिशा-निर्देश जारी करते हुए साफ कर दिया है कि केवल अपराध की भयावहता के आधार पर किसी आरोपी को फांसी की सजा नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी की सामाजिक, आर्थिक और मानसिक परिस्थितियों का गहराई से अध्ययन करना बेहद जरूरी है, ताकि न्याय प्रक्रिया पूरी तरह संतुलित और मानवीय बनी रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों और हाईकोर्ट्स द्वारा अपनाई जा रही प्रक्रिया पर चिंता जताते हुए कहा कि कई मामलों में पर्याप्त जांच और परिस्थितियों का विश्लेषण किए बिना मौत की सजा सुना दी जाती है। अदालत के मुताबिक, सिर्फ अपराध की क्रूरता देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी देखना होगा कि आरोपी के सुधार की संभावना कितनी है और उसकी पृष्ठभूमि क्या रही है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि अब किसी भी दोषी को फांसी की सजा सुनाने से पहले उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत परिस्थितियों से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट अनिवार्य रूप से मंगाई जाएगी। यदि ट्रायल कोर्ट ऐसा करने में विफल रहती है, तो हाईकोर्ट को डेथ रेफरेंस के दौरान यह प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मौत की सजा का सामना कर रहे हर दोषी को मजबूत और निष्पक्ष कानूनी सहायता मिलनी चाहिए। इसके लिए कानूनी सेवा समितियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे एक वरिष्ठ वकील और कम से कम दो अनुभवी अधिवक्ताओं की टीम नियुक्त करें, ताकि आरोपी का पक्ष प्रभावी ढंग से रखा जा सके।
शीर्ष अदालत के इस फैसले को भारतीय न्याय व्यवस्था में एक बड़े सुधार के रूप में देखा जा रहा है। कोर्ट ने दोहराया कि फांसी की सजा केवल “दुर्लभ से दुर्लभतम” मामलों में ही दी जानी चाहिए और इसके लिए हर मानवीय पहलू का गंभीरता से मूल्यांकन जरूरी है। इस फैसले से यह संदेश गया है कि न्यायिक प्रक्रिया में जल्दबाजी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और निष्पक्षता सर्वोपरि होनी चाहिए।



