धन्य हैं काशीपुर के ‘विद्वान’ इंजीनियर! बना दिया ऐसा नाला जिसकी मंजिल का पता नहीं; अब गंदे पानी के बीच ‘पीली ईंटों’ का खेल शुरू?
अज़हर मलिक
काशीपुर : अगर आपको आधुनिक इंजीनियरिंग का कोई अनोखा नमूना देखना है, तो मिनी बायपास स्थित गुरुद्वारा रोड टी-पॉइंट पर चले आइए। यहाँ जिम्मेदार विभाग के ‘महान’ इंजीनियरों और ठेकेदारों ने मिलकर एक ऐसा नाला तैयार किया है, जिसे देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी अपना सिर पकड़ लेंगे। सरकारी बजट को ठिकाने लगाने की ऐसी जल्दबाजी दिखाई गई कि नाला तो बना दिया, लेकिन वह पानी लेकर जाएगा कहाँ? इसका ‘रोडमैप’ बनाना साहब शायद भूल गए। परिणाम यह है कि आज सड़कों पर गंदे पानी का अंबार लगा है और आम जनता इस नरक से गुजरने को मजबूर है।
इंजीनियरिंग का ‘कमाल’ या बजट का ‘धमाल’?
सवाल उठता है कि आखिर वो कौन से काबिल इंजीनियर थे जिन्होंने नाले के निर्माण की मंजूरी तो दे दी, लेकिन निकासी का इंतजाम करना जरूरी नहीं समझा? क्या यह सिर्फ सरकारी खजाने को चूना लगाने की एक तरकीब थी? आज स्थिति यह है कि जनता के टैक्स का पैसा सड़क पर बह रहे गंदे पानी में तैर रहा है। निकासी न होने की वजह से बना-बनाया नाला अब जनता के लिए जी का जंजाल बन चुका है।
भ्रष्टाचार की नई ‘पीली’ बुनियाद!
अब खबर है कि इस गंदे पानी से निजात दिलाने के लिए एक छोटे सहायक नाले का निर्माण होना है। लेकिन निर्माण शुरू होने से पहले ही ‘पीली ईंटों’ के अंबार ने चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। सड़क किनारे उतरीं ये ‘थर्ड क्वालिटी’ की पीली ईंटें खुद में एक बड़ा सस्पेंस हैं।
हालाँकि, अभी यह आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं है कि ये ईंटें विभाग के इसी काम के लिए आई हैं या किसी ने अपनी निजी इस्तेमाल के लिए यहाँ रखवाई हैं, लेकिन चर्चाएं आम हैं कि क्या भ्रष्टाचार के इस ‘पौधे’ पर अब पीली ईंटों वाले घटिया निर्माण के ‘फल’ लगने वाले हैं?
सस्पेंस और सवाल: क्या मुकर जाएंगे ठेकेदार?
जानकार बताते हैं कि टेंडर प्रक्रिया में कहीं भी पीली ईंटों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं होती। ऐसे में सवाल यह है कि अगर ये ईंटें नाले के काम के लिए हैं, तो क्या जिम्मेदार अधिकारी और ठेकेदार मिलकर एक और भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड बनाने की तैयारी में हैं? सस्पेंस यह भी है कि कहीं काम शुरू होने पर विरोध देखकर ठेकेदार यह न कह दे कि— “साहब, ये ईंटें मेरी हैं ही नहीं!”
कुंभकरणी नींद में विभाग
चाहे वह नाले की गलत डिजाइन हो या अब घटिया सामग्री की आहट, संबंधित विभाग के अधिकारी फिलहाल मौन साधे हुए हैं। क्या उच्च अधिकारी इस ‘इंजीनियरिंग फेलियर’ और घटिया सामग्री के संभावित इस्तेमाल पर संज्ञान लेंगे, या फिर काशीपुर की जनता को इसी तरह गंदे पानी और भ्रष्टाचार के दलदल में धकेला जाता रहेगा?





