कॉर्बेट के जंगलों में ‘साइलेंट सफारी’ का इंतजार: क्या पुरानी जिप्सियों की जगह लेंगे इलेक्ट्रिक वाहन?

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कॉर्बेट के जंगलों में ‘साइलेंट सफारी’ का इंतजार: क्या पुरानी जिप्सियों की जगह लेंगे इलेक्ट्रिक वाहन?

अज़हर मलिक 

रामनगर/नैनीताल: उत्तराखंड का जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क और नैनीताल के जंगल अपनी खूबसूरती और बाघों की दहाड़ के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं। हर साल लाखों पर्यटक यहाँ ‘जंगल सफारी’ का लुत्फ उठाने आते हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज के आधुनिक दौर में भी यहाँ पर्यटकों को दशकों पुरानी, शोर मचाती और धुआं छोड़ती जिप्सियों में सफर करना पड़ता है।

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हाल के दिनों में वन विभाग और कई ऑटोमोबाइल कंपनियों ने यहाँ नई गाड़ियों जैसे जिम्नी (Jimny) और बोलेरो (Bolero) के ट्रायल तो किए, लेकिन तकनीकी कारणों या विभाग की शर्तों की वजह से बात आगे नहीं बढ़ पाई। इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बनाने वाली दिग्गज कंपनियाँ इस बड़े मौके को क्यों गँवा रही हैं?

जंगल में ‘EV’ क्यों है सबसे बेहतर विकल्प?

अगर फॉरेस्ट विभाग और ईवी कंपनियां तालमेल बिठाएं, तो इसके तीन सबसे बड़े फायदे होंगे:

ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति : पेट्रोल और डीजल इंजन का शोर जानवरों को विचलित करता है और कई बार वो पर्यटकों की नजरों से दूर भाग जाते हैं। इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बिल्कुल शांत होती हैं। बिना शोर के जंगल में घूमना न केवल जानवरों के लिए सुखद होगा, बल्कि पर्यटकों को भी प्रकृति की आवाज़ें सुनने को मिलेंगी।

वायु प्रदूषण पर लगाम: कॉर्बेट जैसे ‘इको-सेंसिटिव जोन’ में डीजल का धुआं पेड़ों और वन्यजीवों की सेहत के लिए खतरा है। EV जीरो एमिशन (Zero Emission) के साथ इस अनमोल धरोहर को सुरक्षित रखेगी।

ताकत और टॉर्क: इलेक्ट्रिक गाड़ियों में ‘इंस्टेंट टॉर्क’ मिलता है, जो कीचड़, रेतीले रास्तों और चढ़ाई पर पारंपरिक जिप्सियों से कहीं ज्यादा ताकत दिखा सकती हैं।

आखिर कंपनियां और विभाग सुस्त क्यों हैं?

हैरानी की बात यह है कि जहाँ दुनिया ईवी की तरफ बढ़ रही है, वहां अभी तक किसी बड़ी ईवी कंपनी ने कॉर्बेट की मुश्किल राहों पर अपने वाहन का ट्रायल करने की जहमत नहीं उठाई।

कंपनियों की बेरुखी: शायद ईवी कंपनियों को लगता है कि जंगल के पथरीले और कच्चे रास्तों पर बैटरी बैकअप फेल हो सकता है। लेकिन 2026 की आधुनिक तकनीक में ऐसी बैटरियां मौजूद हैं जो धूल, पानी और झटकों को आसानी से झेल सकती हैं।

इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव: फॉरेस्ट गेट्स पर चार्जिंग पॉइंट्स की कमी भी एक बड़ा कारण है। अगर विभाग हर गेट पर सोलर चार्जिंग स्टेशन बनाए, तो खर्च न के बराबर हो जाएगा।

 बदलाव की जरूरत

पुरानी जिप्सियां न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रही हैं, बल्कि पर्यटकों के अनुभव को भी सीमित कर रही हैं। वन विभाग को चाहिए कि वे खुद आगे बढ़कर ईवी कंपनियों को आमंत्रित करें और कंपनियों को भी चाहिए कि वे अपनी गाड़ियों को सिर्फ सड़कों तक सीमित न रखकर, जंगल की चुनौतियों के लिए तैयार करें।

अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो उत्तराखंड का जिम कॉर्बेट दुनिया का पहला ‘ग्रीन एंड साइलेंट’ सफारी जोन बन सकता है।

 

 

 

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