देवभूमि की अदालतों में इंसाफ की ‘सुपरफास्ट’ रफ्तार, मुकदमों के बोझ तले दबी फाइलों ने तोड़ी जंजीरें!
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कानूनी पचड़े को सुलझने में पीढ़ियां गुजर जाती हैं, वहां अचानक फाइलों का पहाड़ दरकने लगे तो इसे क्या कहेंगे? उत्तराखंड के न्यायिक गलियारों से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सबको हैरान कर दिया है। जब दुनिया नए साल के जश्न में डूबी थी, तब पर्दे के पीछे एक ऐसी ‘क्लीन स्वीप’ की पटकथा लिखी जा रही थी, जिसकी भनक किसी को नहीं थी। सूचना के अधिकार के तहत जो आंकड़े बाहर आए हैं, वे न सिर्फ सुकून देने वाले हैं बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत भी दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या सालों से लंबित मामलों का अंत अब करीब है?
काशीपुर के आरटीआई कार्यकर्ता नदीम उद्दीन द्वारा निकाली गई जानकारी ने यह साफ कर दिया है कि साल 2025 उत्तराखंड के लिए ‘न्याय की गति’ वाला साल रहा। जहां साल की शुरुआत में मुकदमों का आंकड़ा आसमान छू रहा था, वहीं साल खत्म होते-होते इसमें 48 हजार से अधिक की बड़ी सेंध लग चुकी है। गौर करने वाली बात यह है कि उत्तराखंड के 9 जिलों ने इस रेस में बाजी मारते हुए नए दर्ज होने वाले केसों से कहीं अधिक मुकदमों का निपटारा कर दिखाया है। हालांकि, हाईकोर्ट की फाइलों में अभी भी इजाफा दर्ज हुआ है, लेकिन अधीनस्थ न्यायालयों ने अपनी कार्यक्षमता से एक नई लकीर खींच दी है।
आंकड़ों की गहराई में उतरें तो पता चलता है कि 1 जनवरी 2025 को जो मुकदमों का बोझ 3.84 लाख के पार था, वह साल के अंत तक घटकर 3.35 लाख पर आ गया है। इस पूरी प्रक्रिया में हरिद्वार, देहरादून और उधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों ने रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया है। अकेले हरिद्वार में ही 19 हजार से ज्यादा पुराने केसों को विदा किया गया। हालांकि अल्मोड़ा, बागेश्वर और चमोली जैसे पहाड़ी जिलों में मामूली बढ़ोत्तरी जरूर हुई है, लेकिन प्रदेश के ओवरऑल परफॉर्मेंस ने इसे दबा दिया है। पूरे प्रदेश में 120 प्रतिशत की ‘डिस्पोजल रेट’ यह बताने के लिए काफी है कि अब तारीख-पर-तारीख का दौर पुराने मुकदमों के निपटारे के आगे फीका पड़ रहा है।