मौत के मुहाने पर नौनिहाल: रामनगर परिवहन विभाग की कुंभकर्णी नींद या बड़े हादसे का इंतजार?
रामनगर। शिक्षा के मंदिरों में ज्ञान की अलख जगाने वाले जब व्यापार के मोह में अंधे हो जाएं, तो मासूमों की जिंदगी दांव पर लगनी तय है। पर्यटन नगरी रामनगर की सड़कों पर इन दिनों ‘सफेद हाथी’ बना परिवहन विभाग और बेलगाम प्राइवेट स्कूल संचालक मिलकर मासूम बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जिस स्कूल बस को सुरक्षा का कवच होना चाहिए था, वह आज ‘मौत का चलता-फिरता ताबूत’ नजर आ रही है।
नियमों की धज्जियां, मासूमों की जान जोखिम में
नगर के प्राइवेट स्कूलों में संचालित बसों में सुरक्षा मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आलम यह है कि क्षमता से दोगुने बच्चे बसों में भेड़-बकरियों की तरह ठूंस-ठूंस कर भरे जा रहे हैं। वाहन चालक न तो सीट बेल्ट का प्रयोग कर रहे हैं और न ही गति सीमा का पालन। सड़क सुरक्षा के नियमों को मानों इन चालकों ने अपने टायरों के नीचे कुचल दिया है। विडंबना देखिए कि जो स्कूल प्रशासन शिक्षा की नैतिकता की बात करता है, वह आज सिर्फ पैसों की अंधी दौड़ और बिजनस में व्यस्त है।
क्या पोलियो ग्रस्त हो गया है परिवहन विभाग?
रामनगर परिवहन विभाग, जिस पर सड़क सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वह पूरी तरह अपाहिज नजर आ रहा है। विभाग की कार्यप्रणाली को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो उसके ‘कंधे पोलियो ग्रस्त’ हो चुके हैं, जो अब जिम्मेदारियों का बोझ उठाने के काबिल नहीं रहे। कार्रवाई के नाम पर केवल चालानों का कोटा पूरा कर खानापूर्ति की जा रही है, जबकि हकीकत में सड़कों पर ‘यमराज’ बनकर दौड़ती इन बसों पर कोई लगाम नहीं है।
”क्या विभाग फिर किसी भीषण हादसे की प्रतीक्षा कर रहा है? उत्तराखंड को झकझोर देने वाले पुराने हादसों से क्या हमने कोई सबक नहीं सीखा?”
हादसों के जख्म भरे, तो विभाग फिर सोया
गौरतलब है कि रामनगर क्षेत्र में पूर्व में हुए भीषण सड़क हादसों ने पूरे प्रदेश को रुलाया था। उस वक्त विभाग कुछ दिनों के लिए जागा, सख्ती भी दिखी, लेकिन जैसे ही हादसों की सुर्खियां ठंडी हुईं, विभाग फिर से गहरी नींद में चला गया। एक संवेदनशील टूरिस्ट क्षेत्र होने के बावजूद यातायात व्यवस्था की यह बदहाली विभागीय अधिकारियों की घोर लापरवाही को उजागर करती है।
अगर समय रहते इन बेलगाम स्कूल प्रबंधकों और लापरवाह परिवहन अधिकारियों पर नकेल नहीं कसी गई, तो रामनगर की सड़कों पर मासूमों की चीखें गूंजने में देर नहीं लगेगी। सवाल यह है कि आखिर इन नौनिहालों की जिंदगी का सौदागर कौन है?


