मेडिकल लापरवाही के आरोप साबित नहीं कर सकीं शाहीन उर्फ गुड़िया, आंचल हॉस्पिटल के खिलाफ 14.20 लाख रुपये का दावा खारिज

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मेडिकल लापरवाही के आरोप साबित नहीं कर सकीं शाहीन उर्फ गुड़िया, आंचल हॉस्पिटल के खिलाफ 14.20 लाख रुपये का दावा खारिज

 

उपभोक्ता आयोग ने कहा- सेवा में कमी, चिकित्सीय लापरवाही और अनुचित व्यापार व्यवहार के आरोपों के समर्थन में पर्याप्त नहीं मिले साक्ष्य

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शानू कुमार ब्यूरो उत्तर प्रदेश

 

(संवाददाता बरेली) : जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-द्वितीय ने आंवला स्थित आंचल हॉस्पिटल से जुड़े मेडिकल लापरवाही मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए शाहीन उर्फ गुड़िया द्वारा दायर परिवाद खारिज कर दिया। आयोग ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर डॉ. आकांक्षा मणि, डॉ. राहुल, डॉ. वर्मा तथा आंचल हॉस्पिटल के खिलाफ चिकित्सीय लापरवाही, सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार के आरोप सिद्ध नहीं हो सके।

 

 

 

14.20 लाख रुपये के दावे के साथ पहुंची थीं आयोग

 

शाहीन उर्फ गुड़िया ने अपनी पुत्री शाजिया के इलाज में कथित लापरवाही का आरोप लगाते हुए आयोग में परिवाद दायर किया था। शिकायत में 4.20 लाख रुपये इलाज व्यय तथा 10 लाख रुपये मानसिक एवं शारीरिक क्षतिपूर्ति सहित कुल 14.20 लाख रुपये दिलाए जाने की मांग की गई थी।

 

 

डॉक्टर द्वारा मरीज को न देखने का आरोप साबित नहीं

 

परिवाद में आरोप लगाया गया था कि डॉ. आकांक्षा मणि ने मरीज को देखे बिना नर्स के माध्यम से जांच कराने की सलाह दी थी। आयोग ने अस्पताल के ओपीडी रिकॉर्ड और उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद कहा कि इस आरोप के समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

 

 

 

जांच केंद्र भेजने और कमीशनखोरी के आरोप भी खारिज

 

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि मरीज को एक विशेष जांच केंद्र से ही जांच कराने के लिए कहा गया तथा अनावश्यक जांचें लिखी गईं। आयोग ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि किसी विशेष सेंटर पर जांच कराने का दबाव बनाया गया था। आयोग ने यह भी कहा कि जिन जांचों पर सवाल उठाया गया, वही जांचें बाद में अन्य अस्पतालों द्वारा भी कराई गई थीं।

 

 

 

गलत इंजेक्शन से हालत बिगड़ने का दावा नहीं माना

 

परिवाद में यह भी आरोप लगाया गया था कि गलत इंजेक्शन लगाने से मरीज की स्थिति गंभीर हुई। आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई चिकित्सकीय दस्तावेज मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि किसी इंजेक्शन के कारण मरीज को संक्रमण या अन्य गंभीर समस्या हुई थी।

 

 

 

दुर्व्यवहार और धमकी के आरोपों को नहीं मिला समर्थन

 

शिकायतकर्ता ने अस्पताल पक्ष पर गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप लगाया था। आयोग ने कहा कि इस संबंध में न तो कोई स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत की गई और न ही किसी पुलिस शिकायत का रिकॉर्ड दाखिल किया गया। ऐसे में यह आरोप भी सिद्ध नहीं हो सका।

 

 

 

 

पुरानी बीमारी का भी आदेश में जिक्र

 

आयोग ने अपने आदेश में कहा कि अभिलेखों से यह तथ्य भी सामने आया कि मरीज को ओवरी में सिस्ट की समस्या पहले से थी और उसका इलाज पूर्व में भी चल रहा था। इस संबंध में पुराने अल्ट्रासाउंड और मेडिकल रिकॉर्ड आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे।

 

 

 

 

आयोग ने कहा कि मेडिकल लापरवाही साबित करने के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकीय अभिमत महत्वपूर्ण होता है। शिकायतकर्ता की ओर से कोई विशेषज्ञ राय प्रस्तुत नहीं की गई। आयोग ने इस संबंध में उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया।

 

 

 

सेवा में कमी और मेडिकल लापरवाही साबित न होने पर परिवाद खारिज

 

अध्यक्ष दीपक कुमार त्रिपाठी और सदस्य दिनेश कुमार गुप्ता की पीठ ने 30 मई 2026 को पारित अपने आदेश में कहा कि विपक्षी पक्ष के खिलाफ सेवा में कमी, चिकित्सीय लापरवाही अथवा अनुचित व्यापार व्यवहार का कोई आरोप प्रमाणित नहीं हुआ। इसी आधार पर आयोग ने परिवाद खारिज करते हुए दोनों पक्षों को अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने के निर्देश दिए।

 

 

 

न्यायिक प्रक्रिया पर जताया विश्वास

 

निर्णय के बाद विपक्षी पक्ष की ओर से कहा गया कि उन्हें न्यायालय और विधिक प्रक्रिया पर पूरा विश्वास था। आयोग ने उपलब्ध अभिलेखों और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय पारित किया है, जिसका वे सम्मान करते हैं। उनका कहना है कि आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि उनके खिलाफ लगाए गए चिकित्सीय लापरवाही और सेवा में कमी के आरोप प्रमाणित नहीं हो सके।

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