नए डीएफओ को लकड़ी माफियाओं की ‘सलामी’, तराई पश्चिमी डिवीजन में सुरक्षा तंत्र की खुली पोल
सलीम अहमद साहिल / अज़हर मलिक
तराई पश्चिमी डिवीजन रामनगर के नए डीएफओ पुनीत तोमर के कार्यभार संभालते ही लकड़ी माफियाओं ने जंगलों में कटान कर उन्हें खुली चुनौती दे डाली है। अधिकारियों और कर्मचारियों की तथाकथित लंबी गश्त और कड़े सुरक्षा दावों की धज्जियां उड़ाते हुए तस्करों ने वन विभाग की साख को ठेंगे पर रख दिया है। बरसात के इस मौसम में, जब जंगलों के भीतर कीचड़ और पानी भरे होने के कारण आम इंसान का पैदल चलना तक मुश्किल हो जाता है, उस वक्त तस्कर बेशकीमती खैर की लकड़ी काटकर जंगलों से बाहर गांव तक लाने में कामयाब हो गए। विभाग द्वारा जंगलों की सुरक्षा के नाम पर बनाई गई चौकियों, चेक पोस्टों और भारी भरकम दावों के बावजूद इस तरह बड़े पैमाने पर तस्करी होना वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
इस पूरी कार्रवाई ने वन विभाग के खुफिया तंत्र को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। मालधन चौड़ के तुमाड़िया डैम क्षेत्र से खैर की लकड़ी के 9 गिल्टे बरामद होने की सफलता वन विभाग की अपनी सतर्कता से नहीं, बल्कि मालधन पुलिस की खुफिया सूचना और सूझबूझ के कारण मिली है। जहाँ एक तरफ मालधन पुलिस का खुफिया तंत्र पूरी तरह सक्रिय नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ जंगलों की हिफाजत की मुख्य जिम्मेदारी उठाने वाला वन विभाग कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ है। अगर मालधन पुलिस समय पर सटीक सूचना न देती, तो तस्कर इस बेशकीमती लकड़ी को ठिकाने लगाकर लाखों का वारे-न्यारे कर चुके होते। यह घटना दर्शाती है कि सुरक्षा में कितनी बड़ी सेंध लगी हुई है और विभागीय लापरवाही किस कदर हावी है।
वन विभाग हर साल बरसात के मौसम में तराई पश्चिमी डिवीजन रामनगर की कई रेंजों के अधिकारी और कर्मचारीयों का भारी-भरकम लाव-लश्कर के साथ जंगलों के भीतर और जंगल से सटे गांवों के आसपास लंबी दूरी की पैदल गश्त करते हैं। इस गश्त का मकसद जंगलों में अवैध पातन और वन्यजीव शिकार पर लगाम कसना और तस्करों के बीच वन विभाग का खौफ कायम करना होता है, लेकिन इस बार लकड़ी तस्करों ने वन विभाग की लंबी दूरी की गश्त के पूरे भोकाल को ठेंगे पर रख दिया है और नए डीएफओ पुनीत तोमर के सामने सीधे चुनौती खड़ी कर दी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि मालधन पुलिस की मदद से 9 गिल्टे तो बरामद कर लिए गए, लेकिन तस्करों ने खैर के और कितने पेड़ों को ठिकाने लगाया होगा, जिसकी भनक तक वन विभाग को नहीं लगी। इतने कड़े पहरे और चौकियों के बावजूद आखिर किस तरह भारी-भरकम खैर की लकड़ियां जंगल से बाहर निकल गईं? क्या यह सिर्फ वन कर्मचारियों की लापरवाही है या फिर लकड़ी माफिया और विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों की साठगांठ का नतीजा है? नए डीएफओ को मिली इस लकड़ी तस्करो कि ‘सलामी’ के बाद अब उन्हें न केवल बाहरी तस्करों पर नकेल कसनी होगी, बल्कि विभाग के अंदर छिपे काले भेड़ीयो और अपने ही कर्मचारियों पर पैनी नजर रखनी होगी, ताकि जंगलों की बेखौफ लूट पर लगाम लगाई जा सके।



