हजूर! ‘जंगल जासूस’ की नौसिखिया पत्रकारिता का सच: 2-2 हजार में डोमेन खरीदकर पत्रकार बने लोगों को सेवाभाव से इतनी चिढ़ क्यों?
उत्तराखंड: आजकल डिजिटल मीडिया के नाम पर गजब की बाढ़ आई हुई है। न कोई मानक, न पत्रकारिता की बुनियादी समझ, न रजिस्ट्रेशन का अता-पता—बस 2-2 हजार रुपये देकर एक डोमेन खरीदा, एक फ्री वेब टेंप्लेट चिपकाया और बन गए ‘स्वयंभू पत्रकार’! फिर शुरू होता है ग्राउंड रिपोर्टिंग के नाम पर दफ्तरों के चक्कर काटना, किसी भी ईमानदार अधिकारी पर बेबुनियाद कीचड़ उछालना और मनगढ़ंत कहानियों को मसालेदार बनाकर अपनी फर्जी दुकान चलाना।
हाल ही में ‘जंगल जासूस’ नाम के ऐसे ही एक पोर्टल पर बागेश्वर के सम्मानित और लोकप्रिय वनाधिकारी (DFO) प्रकाश चंद्र आर्य के खिलाफ एक बेहद बचकानी और दुर्भावनापूर्ण रिपोर्ट परोसी गई है। रिपोर्ट में साहब की सोशल मीडिया सक्रियता को रिटायरमेंट के बाद चुनाव लड़ने की ‘राजनीतिक नेट प्रैक्टिस’ करार देने का हास्यास्पद प्रयास किया गया है।
डिजिटल दौर में अगर कोई अधिकारी सोशल मीडिया पर सक्रिय है, जंगलों के संरक्षण के लिए जनता को जागरूक कर रहा है, अपने महकमे के पारदर्शी काम दिखा रहा है और वन्यजीवों के प्रति अपने अटूट प्रेम को साझा कर रहा है, तो उसमें पत्रकारिता के नाम पर बट्टा लगाने वालों को मिर्ची क्यों लग रही है? जिन्हें खुद पत्रकारिता के ‘प’ का ज्ञान नहीं है और जो टेबल पर बैठकर मनगढ़ंत गॉसिप छापते हैं, वे एक उच्च शिक्षित और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी को ‘पब्लिसिटी’ का ज्ञान बांट रहे हैं!
पोर्टल के तथाकथित रिपोर्टर ने अपनी ही रिपोर्ट में दबी जुबान यह मान लिया कि “चुनाव लड़ने की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है”, लेकिन इसके बावजूद व्यूज और सस्ती टीआरपी बटोरने के लिए हेडलाइन में चुनाव का तड़का लगा दिया। जब कोई पुख्ता सबूत नहीं, कोई आधिकारिक बयान नहीं, तो ऐसी खबरें छापना सिवाय अपनी अज्ञानता और घटिया पत्रकारिता का ढिंढोरा पीटने के और कुछ नहीं है। डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य एक बेहद अनुभवी, शालीन और जनता के चहेते अधिकारी हैं। सेवा के अंतिम पड़ाव पर भी अगर वे चौबीसों घंटे जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा में डटे हुए हैं, तो यह उनका जुनून है, कोई सियासी दांव नहीं।
डीएफओ साहब का प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति प्रेम सर्वविदित है। बागेश्वर के जंगलों को सुरक्षित रखने, ग्रामीणों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को कम करने तथा वन विभाग को तकनीक से जोड़ने में उनका योगदान सराहनीय रहा है। लेकिन जिन तथाकथित ‘पत्रकारों’ को सिर्फ नकारात्मकता ढूँढने की बीमारी हो, उन्हें एक अधिकारी का सेवाभाव और जनता से जुड़ाव भी ‘फिल्मी ड्रामा’ ही नजर आएगा।
नेताओं का काम बयानबाजी करना है और स्थानीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं। लेकिन किसी राजनीतिक बयान को आधार बनाकर एक समर्पित सरकारी सेवक की साख पर सवाल उठाना यह साबित करता है कि इस पोर्टल का उद्देश्य निष्पक्ष खबर देना नहीं, बल्कि केवल सनसनी फैलाना है।
फर्जी वेबसाइटें बनाकर अपने आप को ‘ग्राउंड जीरो रिपोर्टर’ कहने वाले इन महानुभावों को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जनता अब बेवकूफ नहीं है। जनता अच्छी तरह जानती है कि कौन ईमानदारी से जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा कर रहा है और कौन केवल डोमेन खरीदकर पत्रकारिता के नाम पर वसूली और सस्ती पब्लिसिटी का खेल खेल रहा है। डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य एक बेहद काबिल और जनप्रिय अधिकारी हैं, और ऐसी हल्की-फुल्की पीत पत्रकारिता से उनकी छवि पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला!



