प्रकृति की पुकार सुन दुर्गम पगडंडियों पर उतरे DFO प्रकाश चंद्र आर्य: पहाड़ों की प्राकृतिक धरोहर बचाने की जंग, धरातल सभाला मोर्चा।
अज़हर मालिक/ सलीम अहमद साहिल
बदलते वक्त के साथ पहाड़ों की जवानी भी बदलते पर्यावरण की मार झेल रही है। सूखते झरने, सिकुड़ते जलस्रोत, नदियों में घटता जलस्तर और तेजी से पिघलते ग्लेशियर प्रकृति के बिगड़ते संतुलन की गंभीर चेतावनी दे रहे हैं। आज यदि प्रकृति की इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पर्यावरण में हो रहे ये बदलाव केवल प्रकृति की चिंता नहीं, बल्कि मानव जीवन और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल हैं। ऐसे चुनौतीपूर्ण दौर में बागेश्वर वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी प्रकाश चंद्र आर्य प्रकृति संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ने की दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं। उनका उद्देश्य केवल जंगलों की सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि समाज को जल, जंगल और वन्यजीवों के संरक्षण के प्रति जागरूक कर प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भाव मजबूत करना भी है।

बागेश्वर प्रभागीय वनाधिकारी प्रकाश चंद्र आर्य और उनकी टीम संरक्षण के संदेश को दफ्तरों की चारदीवारी से निकालकर पहाड़ो कि पगडंडियों से होते हुए धरातल पर जन-जन तक पहुंचाने में जुटी है। जनता के बीच पहुंचकर प्राकृतिक जलस्रोतों के महत्व, पारंपरिक नौलों और धारों के संरक्षण तथा वनों की हरियाली को बनाए रखने की आवश्यकता समझाने का प्रयास किया जा रहा है। जंगलों की हरियाली केवल पहाड़ों की सुंदरता नहीं, बल्कि जीवनदायिनी हवा, वर्षा चक्र, मिट्टी के संरक्षण और प्राकृतिक जलस्रोतों के अस्तित्व से भी गहराई से जुड़ी है। हरे-भरे जंगल प्रकृति की ढाल हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने के साथ असंख्य जीव-जंतुओं को सुरक्षित आश्रय प्रदान करते हैं। इसके साथ ही, बढ़ता मानव–वन्यजीव संघर्ष भी एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आ रहा है। जंगलों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों की सुरक्षा और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों का संरक्षण, दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। लोगों को वन्यजीवों के व्यवहार, जंगलों के नजदीक बरती जाने वाली सावधानियों और संघर्ष की घटनाओं से बचाव के प्रति जागरूक करना इस दिशा में अहम भूमिका निभाता है। यह पहल इस सोच को मजबूती देती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का साझा कर्तव्य है। जंगल सुरक्षित रहेंगे, जलस्रोत जीवंत रहेंगे और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास संरक्षित होंगे, तभी प्रकृति का संतुलन कायम रह सकेगा।

आज जरूरत केवल पर्यावरण में आ रहे बदलावों पर चिंता जताने की नहीं, बल्कि धरातल पर जिम्मेदारी के साथ कदम उठाने की है। पानी की हर बूंद को सहेजना, पारंपरिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने के प्रयास करना, जंगलों की रक्षा करना और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखना ही आने वाले कल को बचाने का मजबूत आधार है। DFO प्रकाश चंद्र आर्य के नेतृत्व में बागेश्वर वन प्रभाग द्वारा प्रकृति संरक्षण और जनजागरूकता को जनभागीदारी से जोड़ने के प्रयास इसी दिशा में महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। जंगलों की हरियाली को बचाना, नए पौधों के संरक्षण को बढ़ावा देना और प्राकृतिक संपदा के प्रति जनमानस में जिम्मेदारी जगाना ही पर्यावरण को सुरक्षित रखने की मजबूत नींव है। संदेश साफ है। प्रकृति सुरक्षित होगी, तभी जीवन सुरक्षित रहेगा। जल बचेगा तो कल बचेगा, जंगलों की हरियाली बचेगी तो प्रकृति का संतुलन बचेगा और वन्यजीव सुरक्षित रहेंगे तो मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने की राह मजबूत होगी। अपनी प्राकृतिक धरोहर को बचाना आज की जरूरत ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।



