एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी: गजब  पटवारियों का खेल, फर्जीवाड़े की आंच पर काम ठप!

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एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी: गजब  पटवारियों का खेल, फर्जीवाड़े की आंच पर काम ठप!

अज़हर मलिक

जनपद ऊधम सिंह नगर में कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर तैयार हुए फर्जी प्रमाण पत्रों का मामला इस समय पूरे जिले की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। फर्जी कागजातों का सहारा लेकर मेडिकल कॉलेजों समेत कई अन्य जगहों पर अनुचित लाभ उठाने के इस बड़े खेल में जब गाज गिरी और दोषी पटवारियों पर निलंबन की तलवार चली, तो ‘उत्तराखंड लेखपाल संघ’ अचानक आक्रोश में आ गया। विगत लगभग 30 दिनों से प्रमाण पत्र जारी करने की आख्या रिपोर्ट रोकने और काम ठप करने के कारण आम जनता प्रमाण पत्रों के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। सवाल यह उठता है कि जब ऑनलाइन आवेदन में सिर्फ स्कैन प्रति संलग्न होती है, तो बिना मूल अभिलेख (Original Documents) देखे और बिना मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किए पटवारी अपनी ‘पॉजिटिव आख्या’ किस आधार पर लगा देते हैं? कानूनन आख्या लगाने की पूरी नैतिक और विधिक जिम्मेदारी राजस्व उप निरीक्षक (पटवारी) की ही होती है। ऐसे में निलंबन की निष्पक्ष कार्रवाई से घबराकर काम बंद कर देना और जनता को ढाल बनाना पटवारियों की कार्यशैली पर गहरे निशान खड़े करता है।

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बाजपुर तहसील में ‘खानापूर्ति’ की कार्रवाई: क्या सिर्फ एक ही पटवारी की आईडी से बने फर्जी प्रमाण पत्र? अधिकारियों के ‘बचपे खेल’ पर उठे गंभीर सवाल

 

बाजपुर तहसील में ‘खानापूर्ति’ की कार्रवाई: क्या सिर्फ एक ही पटवारी की आईडी से बने फर्जी प्रमाण पत्र? अधिकारियों के ‘बचपे खेल’ पर उठे गंभीर सवाल

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अब संघ द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि अत्यधिक लोड और शहरी क्षेत्रों में घनी आबादी के कारण हर आवेदन का भौतिक सत्यापन करना उनके लिए संभव नहीं है। लेकिन यह बहाना किसी के गले नहीं उतर रहा, क्योंकि नौकरी जॉइन करते समय हर कर्मचारी प्रशासनिक लोड और अपनी जिम्मेदारियों से भली-भांति अवगत होता है। पद की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर केवल अधिकारों और सुविधाओं का लाभ उठाना और जांच की आंच आते ही जनसेवा ठप कर देना प्रशासनिक आचरण के खिलाफ है। अगर कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर आख्या जारी हुई है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पद के दुरुपयोग का मामला बनता है।

 

 

 

 

 

 

 

इतना ही नहीं, सूत्रों की मानें तो जिले की विभिन्न तहसीलों, विशेषकर बाजपुर क्षेत्र में भी फर्जी प्रमाण पत्रों से जुड़े कई ऐसे संगीन मामले दबाए गए हैं जिनमें संबंधित पटवारियों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी तय थी। लेकिन विभागीय मेहरबानी और उच्च स्तरीय अधिकारियों की ‘दया दृष्टि’ के चलते फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी गईं और दोषी खुले घूम रहे हैं। एक तरफ जहां मामूली फाइलों पर आम जनता को चक्कर कटवाए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ फर्जीवाड़े पर कार्रवाई होते ही हड़ताल का सहारा लेना साफ दर्शाता है कि अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। जनता अब सवाल पूछ रही है कि आखिर कब तक इस तरह से कानून को ताक पर रखकर मनमानी की जाती रहेगी और कब बाजपुर समेत पूरे जिले के दोषी कर्मचारियों पर निष्पक्ष गाज गिरेगी?

 

 

 

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