लीसे की तस्करी पर डीएफओ पुनीत तोमर का शिकंजा। 60 ड्रमों से भरा वाहन पकड़ा; कोसी रेंज और मोहान चेकपोस्ट की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल।
सलीम अहमद साहिल
तराई पश्चिमी वन प्रभाग रामनगर में वन संपदा की अवैध तस्करी के खिलाफ डीएफओ पुनीत तोमर का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। जंगलों से लेकर सड़कों तक वन अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का सिलसिला जारी है, लेकिन इसी बीच वन विभाग की कुछ इकाइयों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। ताजा मामला लीसे की अवैध तस्करी से जुड़ा है, जहां तराई पश्चिमी वन प्रभाग की एसओजी टीम ने मुखबिर की सूचना पर 4 नवंबर की सुबह करीब 4:30 बजे चौसठ गेट के पास छापेमारी कर एक कैंटर वाहन को पकड़ा। तलाशी के दौरान वाहन से लीसे के 60 ड्रम बरामद किए गए। प्रारंभिक जांच के बाद वाहन को वन अभिरक्षा में लेकर कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई। डीएफओ पुनीत तोमर के निर्देशन में एसओजी टीम की इस त्वरित कार्रवाई ने एक बार फिर वन संपदा की अवैध आवाजाही पर विभाग की सतर्कता को सामने रखा है।

लेकिन इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू सिर्फ 60 ड्रम लीसे की बरामदगी नहीं, बल्कि वह रास्ता है, जिससे होकर यह वाहन तराई पश्चिमी वन प्रभाग तक पहुंचा। जानकारी के मुताबिक वाहन अल्मोड़ा जनपद के मोहान क्षेत्र से होते हुए चौसठ गेट तक पहुंचा था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल मोहान चेकपोस्ट की निगरानी व्यवस्था पर खड़ा होता है। यदि चेकपोस्ट पर वाहनों की नियमित जांच होती है तो लीसे से भरा यह कैंटर वहां से बिना किसी रोकटोक के कैसे गुजर गया? आखिर चेकिंग व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई? सवाल कोसी रेंज रामनगर डिवीजन की निगरानी और सूचना तंत्र पर भी हैं। रेंजर कृष्ण कुमार मेहरा के क्षेत्र से होकर गुजर रहे वन उपज से भरे इस संदिग्ध वाहन की भनक संबंधित अधिकारियों को क्यों नहीं लगी? क्या कोसी रेंज में वन संपदा के अवैध परिवहन पर निगरानी महज कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है? या फिर जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही तस्करों के हौसले बुलंद कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि कोसी रेंज के रेंजर कृष्ण कुमार मेहरा अपनी आरामदायक कुर्सी पर बैठकर दफ्तर की चारदीवारी से ही पूरी रेंज का संचालन कर रहे हैं? आखिर जब रेंजर साहब सरकारी गाड़ी में सवार होकर निरीक्षण और गश्त के लिए निकलते हैं, तो क्या रास्तों में तैनात चेकपोस्ट कर्मियों को वाहनों की ईमानदारी और मुस्तैदी से जांच करने की नसीहत देना भूल जाते हैं? अब जब मामला उजागर हो चुका है, तो देखना दिलचस्प होगा कि रेंजर कृष्ण कुमार मेहरा की कलम अपने लापरवाह कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने के लिए भी चलेगी या फिर विभागीय कार्रवाई के पन्नों पर महज औपचारिकता की स्याही फेरकर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? लेकिन चेकपोस्ट और रेंज स्तर पर जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है।
वहीं दूसरी ओर डीएफओ पुनीत तोमर के निर्देशन में तराई पश्चिमी वन प्रभाग की एसओजी टीम ने जिस तत्परता से इस वाहन को पकड़ा है, उसने वन अपराधों के खिलाफ विभाग की कार्रवाई को नई धार दी है। कार्रवाई में वन क्षेत्राधिकारी मथुरा प्रसाद मावड़ी, वन दरोगा मगनलाल, वीरेंद्र परिहार, महेश चंद डसीला और वाहन चालक सुंदर सिंह शामिल रहे। पकड़े गए कैंटर संख्या UK04-CC-8283 के चालक जगदीश चंद्र, निवासी धानाचूली, ओखलकांडा के संबंध में भी आवश्यक कार्रवाई की जा रही है। फिलहाल वन विभाग की जांच और विधिक कार्रवाई जारी है। लेकिन अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 60 ड्रम लीसे की इस खेप के पीछे तस्करी का नेटवर्क कितना बड़ा है और इसकी कड़ियां कहां तक जुड़ी हैं। साथ ही मोहान चेकपोस्ट से लेकर कोसी रेंज की सीमा तक जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और निगरानी व्यवस्था की भी जांच होती है या नहीं। क्योंकि वन संपदा की सुरक्षा केवल जंगलों में गश्त करने से नहीं, बल्कि रास्तों पर तैनात हर जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही सुनिश्चित करने से होगी।