कुर्सी की ‘रंगबाजी’ या जनता से दगाबाजी? काशीपुर में क्षेत्रीय खाद्य अधिकारी की सुस्ती से राशन तंत्र बेपटरी, सवालों के घेरे में मीनाक्षी रावत!

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कुर्सी की ‘रंगबाजी’ या जनता से दगाबाजी? काशीपुर में क्षेत्रीय खाद्य अधिकारी की सुस्ती से राशन तंत्र बेपटरी, सवालों के घेरे में मीनाक्षी रावत!

अज़हर मलिक 

काशीपुर में क्षेत्रीय खाद्य अधिकारी का नया चार्ज संभालते ही व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के बड़े-बड़े दावों की हवा महज़ तीन महीनों के भीतर ही निकल चुकी है। जनता को उम्मीद थी कि नए तेवरों के साथ विभाग में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा, लेकिन मैडम मीनाक्षी रावत के तकरीबन तीन महीने के इस कार्यकाल ने महकमे की कार्यप्रणाली को पूरी तरह सुस्ती के आईसीयू में धकेल दिया है। हैरानी की बात यह है।

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कि इतने लंबे समय में अधिकारी महोदया ने पूरे क्षेत्र में महज़ एक राशन की दुकान का औचक निरीक्षण करने की जहमत उठाई, और उस अकेली जांच में भी क्या गोलमाल पाया गया या क्या सच सामने आया, इस का भी अभी कुछ सामने आया नहीं मीडिया की नजरों से छिपाकर फाइलों में दफन कर दिया गया। पारदर्शिता का ढोंग रचने वाले विभाग की इस रहस्यमयी खामोशी ने भ्रष्टाचार की बू को और तेज कर दिया है, जिसका सीधा खामियाजा काशीपुर की गरीब और लाचार जनता भुगत रही है। स्थिति यह हो चुकी है कि क्षेत्र के कोटेदार बेलगाम हो चुके हैं और राशन की दुकानें सरकार के तय नियमों से नहीं, बल्कि कोटेदारों की अपनी मर्जी और मनमाने समय के मुताबिक खुल और बंद हो रही हैं।

 

 

 

राशन दफ्तर में बैठकर जनता की समस्याओं से आंखें मूंदने का ही नतीजा है कि आज गरीबों की थाली तक पहुंचने वाले सरकारी गेहूं और चावल की गुणवत्ता पर गंभीर और तीखे सवाल खड़े हो रहे हैं; राशन के नाम पर खराब और घटिया अनाज परोसा जा रहा है। बदहाली और मनमानी के इस दलदल में फंसी बेबस जनता त्राहि-त्राहि कर रही है, लेकिन क्षेत्रीय खाद्य अधिकारी मीनाक्षी रावत इस गंभीर अव्यवस्था के खिलाफ कोई भी ठोस या कड़ा कदम उठाने को कतई तैयार नजर नहीं आ रही हैं, जिससे साफ तौर पर प्रशासनिक शह और सरकारी दावों की पोल खुलती दिखाई दे रही है।

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