21 साल पुराना ‘कातिल’ कौन? हल्द्वानी कैसेट व्यापारी मर्डर केस में सबूतों के अभाव ने बदला फैसला, चारों आरोपी बरी
सलीम आदम साहिल
कानून की चौखट पर न्याय भले ही देर से मिले, लेकिन जब कटघरे में खड़े बेगुनाह के सिर से ‘कातिल’ होने का दाग मिटता है, तो दो दशकों का लंबा इंतजार भी थमा सा लगता है। साल 2003 की एक अंधेरी रात, जब हल्द्वानी की नहर किनारे मिले एक व्यापारी के नौकर की लाश ने पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया था। मुरादाबाद के कैसेट व्यापारी का साथी लहूलुहान पड़ा था, 47 हजार 500 रुपये की नगदी और कैसेट गायब थे। उस रात की खौफनाक वारदात के बाद खाकी ने अनिल, इमरान, वासिब और पप्पू पर हथकड़ियां कस दी थीं। वक्त बदला, अदालतें बदलीं—निचली अदालत ने अनिल और इमरान को उम्रकैद और वासिब-पप्पू को एक-एक साल की सलाखों के पीछे भेज दिया। लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब 2013 में हाईकोर्ट ने इन्हें बरी किया, पर सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। देश की सबसे बड़ी अदालत ने मामला वापस नैनीताल हाईकोर्ट की दहलीज़ पर ला खड़ा किया। अब, दो दशक से ज्यादा लंबे चले इस कानूनी ड्रामे के बाद, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पुलिस के जांच चक्रव्यूह और कमजोर साक्ष्यों की धज्जियां उड़ाते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि महज शक के आधार पर किसी की जिंदगी सलाखों में नहीं झोंकी जा सकती और ठोस सबूतों के अभाव में चारों आरोपियों को तमाम आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया गया।



