फर्जी प्रमाणपत्रों के सिंडिकेट में राजस्व तंत्र का मौन संरक्षण, जांच की आंच से बाहर क्यों है पटवारी की कलम?
अज़हर मलिक
उधम सिंह नगर जनपद में फर्जी जाति और निवास प्रमाणपत्रों के खेल ने राजस्व विभाग के प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। बाजपुर में सामने आए फर्जीवाड़े पर दर्ज एफआईआर और गदरपुर में उजागर होते मामलों ने यह साफ कर दिया है कि यह महज किसी व्यक्ति की चालाकी नहीं, बल्कि एक संगठित प्रशासनिक सिंडिकेट की देन है। विडंबना देखिए कि जब भी कोई फर्जी दस्तावेज सुर्खियों में आता है, तो विभाग आनन-फानन में प्रमाणपत्र निरस्त कर और किसी बिचौलिए या आवेदक पर कानूनी कार्रवाई का शिकंजा कसकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है। परंतु यक्ष प्रश्न यह है कि जिस अधिकारी की अंतिम संस्तुति और डिजिटल हस्ताक्षरों से यह प्रमाणपत्र वैध का जामा पहनता है, वह हर बार बेदाग कैसे निकल जाता है?
कागजों की छंटनी, धरातलीय सत्यापन और आवेदक के तथ्यों की भौतिक जांच की प्राथमिक जिम्मेदारी क्षेत्रीय पटवारी की होती है। उच्च शैक्षणिक व प्रतियोगी परीक्षाओं को उत्तीर्ण कर पद पर आसीन होने वाले राजस्व कर्मियों से यह अपेक्षा कतई नहीं की जा सकती कि वे प्रथम दृष्टया जाली और असली दस्तावेजों का अंतर न समझ सकें। यदि कोई पटवारी कूटरचित स्कैन दस्तावेजों को पकड़ने में असमर्थ है, तो यह उसकी व्यावसायिक दक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, और यदि वह सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंदे बैठा है, तो यह सीधे तौर पर पदीय दायित्वों के साथ गद्दारी और भ्रष्टाचार की सांठगांठ की ओर इशारा करता है। तंत्र की इस दोहरी नीति ने जनमानस में यह संदेश दिया है कि कार्रवाई का चाबुक केवल मोहरों पर चलता है, जबकि मुख्य सूत्रधार प्रशासनिक ढाल के पीछे सुरक्षित रहते हैं।
जब तक किसी भी फर्जीवाड़े की जांच में आवेदन स्वीकृत करने वाले और संस्तुति देने वाले अधिकारियों की आपराधिक जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक यह खेल रुकने वाला नहीं है। आवेदनों के डिजिटल निस्तारण की आड़ में भौतिक सत्यापन को ताक पर रखकर जारी किए गए प्रमाणपत्र न केवल वास्तविक पात्रों के अधिकारों पर डाका डालते हैं, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की साख को भी बट्टा लगाते हैं।
शासन और उच्चाधिकारियों को चाहिए कि इस सिंडिकेट की जड़ों पर प्रहार करते हुए जिम्मेदार पटवारियों और राजस्व अधिकारियों पर भी सख्त विभागीय व कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करें, ताकि ‘जांच और निरस्तीकरण’ के नाम पर दामन बचाने का यह सिलसिला हमेशा के लिए बंद हो सके।



