बाजपुर में ‘फ़र्ज़ीवाड़ा एक्सप्रेस’ यूपी के बाशिंदों को उत्तराखंड में ‘पनाह’, फर्जीवाड़े की कलई खुली तो रद्दी में बदला प्रमाण पत्र, आखिर कार्रवाई से कतराते क्यों हैं जिम्मेदार?
अज़हर मलिक
बाजपुर : सीमांत क्षेत्र बाजपुर में प्रशासनिक साठगांठ और फर्जीवाड़े का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसने नगर पालिका परिषद और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में रहने वाले लोगों को बाजपुर में फर्जी दस्तावेजों के बल पर ‘शरण’ दी जा रही है और उनके फर्जी प्रमाणपत्र तैयार किए जा रहे हैं। मामला तब और गंभीर हो जाता है जब सिस्टम अपनी नाकामी छिपाने के लिए शिकायत होते ही कागजों को रातों-रात निरस्त कर अपना पल्ला झाड़ने की नाकाम कोशिश करता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि महीनों से हो रही शिकायतों के बावजूद मुख्य आरोपियों और मेहरबान अधिकारियों के खिलाफ अब तक कानूनी प्राथमिकी (FIR) दर्ज क्यों नहीं हुई?
पूरा मामला बालक शिवा वर्मा के फर्जी जन्म प्रमाण पत्र से जुड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद स्थित जिला महिला चिकित्सालय से पहले ही आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र जारी होने और अस्पताल के लेबर रूम रजिस्टर में तमाम प्रविष्टियां दर्ज होने के बावजूद, बाजपुर नगर पालिका परिषद से दूसरा जन्म प्रमाण पत्र जारी करवा दिया गया। जब शिकायतकर्ता काशिफ अली ने इस फर्जीवाड़े की परतें उधेड़नी शुरू कीं और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से लेकर शासन तक शिकायतों का अंबार लगा दिया, तो हड़कंप मच गया। खुद को फंसता देख और विभागीय जांच की आंच से बचने के लिए बाजपुर प्रशासन ने आनन-फानन में लीपापोती करते हुए उक्त फर्जी जन्म प्रमाण पत्र को निरस्त तो कर दिया, लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू हुआ।
सवाल उठता है कि जब फर्जीवाड़ा साबित हो चुका है और खुद प्रशासन ने स्वीकार किया है कि दस्तावेज गलत तरीके से बने थे, तो फिर दोषी अंकित वर्मा और इस पूरे गठजोड़ में शामिल अधिशासी अधिकारी (EO), उपजिलाधिकारी (SDM) व संबंधित पटल सहायकों के खिलाफ कूटरचित दस्तावेज रचने की गंभीर धाराओं में FIR दर्ज क्यों नहीं की जा रही? क्या केवल एक फर्जी कागज को निरस्त कर देना ही कानून की इतिश्री है? या फिर बाजपुर का प्रशासनिक अमला अपने ही चहेते अफसरों और भू-माफिया या फर्जीवाड़ा करने वाले सिंडिकेट को बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ा है? निरस्तीकरण का आधिकारिक आदेश सार्वजनिक न करना भी इसी बात की ओर इशारा करता है कि पर्दादारी का यह खेल अभी खत्म नहीं हुआ है।
अब यह मामला शासन के गलियारों और विजिलेंस जांच की चौखट तक पहुंच चुका है। शिकायतकर्ता ने उत्तराखंड शासन के शहरी विकास सचिव, विजिलेंस और यूआईडीएआई (UIDAI) तक पत्र भेजकर स्पष्ट कर दिया है कि जब तक इस फर्जीवाड़े के मुख्य सूत्रधारों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता और इस फर्जी आधार कार्ड से हुए वित्तीय लेन-देन की गहन जांच नहीं होती, तब तक यह लड़ाई रुकने वाली नहीं है। अब देखना यह होगा कि शासन इस बाजपुरिया ‘फ़र्ज़ीवाड़ा सिंडिकेट’ पर कब शिकंजा कसता है या फिर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की प्रशासनिक परंपरा यूँ ही जारी रहेगी।



