विकास की आड़ में उजाड़ता जीवन: ऊँचाहार में सदी पुराने रेलवे मार्ग को बंद करने की जिद के खिलाफ फूटा जनसैलाब
नरेंद्र त्रिपाठी रायबरेली
रायबरेली के ऐतिहासिक और व्यस्त नगर ऊँचाहार से एक ऐसी खबर सामने आ रही है जो विकास और जनहित के बीच के नाजुक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े करती है। नगर की पुरानी रेलवे क्रॉसिंग से महादेवन और आसपास के मोहल्लों को जोड़ने वाला लगभग एक सदी पुराना सार्वजनिक मार्ग रेलवे प्रशासन द्वारा बंद किए जाने की कार्रवाई से स्थानीय नागरिकों और दुकानदारों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। भाजपा ओबीसी मोर्चा के प्रांतीय मंत्री अभिलाष कौशल के नेतृत्व में आक्रोशित जनता ने उपजिलाधिकारी को एक ज्ञापन सौंपकर इस मनमाने और तानाशाही कदम के खिलाफ हुंकार भरी है, जिसकी गूंज लखनऊ से लेकर दिल्ली के गलियारों तक पहुँच चुकी है।
इस सौ साल पुराने रास्ते के दोनों ओर फैली लगभग पचास दुकानें केवल व्यापारिक प्रतिष्ठान नहीं हैं, बल्कि दर्जनों परिवारों के चूल्हे जलने का एकमात्र जरिया हैं, जिन पर अब रोजी-रोटी छिन जाने का संकट मंडरा रहा है। इस मार्ग से प्रतिदिन विद्यार्थियों, दुकानदारों और ग्रामीण इलाकों से आने-जाने वाले छह से सात हजार आम नागरिकों का अनवरत तांता लगा रहता है, जो इस क्षेत्र की जीवनरेखा की तरह कार्य करता है। इसके बावजूद, रेल विभाग द्वारा भारी-भरकम जेसीबी मशीनों से खुदाई करवाकर और रातों-रात बाउंड्रीवाल खड़ी करके इस ऐतिहासिक रास्ते को अवरुद्ध करने का जो कुप्रयास किया जा रहा है, वह न केवल जनभावनाओं का अपमान है बल्कि आमजन के मौलिक अधिकारों पर भी सीधा प्रहार है।
इस गंभीर संकट के समाधान के लिए मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, रेल मंत्री भारत सरकार, स्थानीय विधायक सह मंत्री सहित जिले के तमाम शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को प्रतिलिपि भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई गई है। राहुल गुप्ता, संतोष गुप्ता, महेंद्र यादव और पंडित जितेंद्र द्विवेदी समेत सैकड़ों की संख्या में उपस्थित क्षेत्रवासियों ने स्पष्ट शब्दों में चेताया है कि यदि जनहित की इस अनदेखी को तुरंत बंद नहीं किया गया, तो यह स्थानीय आक्रोश एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले लेगा। अब देखना यह है कि प्रशासन और रेल विभाग इस जनविरोधी कार्रवाई पर रोक लगाकर जनता को राहत देता है या फिर विकास के नाम पर बस्तियों की साँसों को यूं ही घोंट दिया जाता है।



