पत्रकारों की कलम पर पहरे का सपना या सवालों से बचने का हथकंडा? समजसेवी के चोले मे छिपे इस व्यक्ति का विवादों से पुराना रिस्ता।
रामनगर में खुद को समाजसेवक बताकर सोशल मीडिया पर ज्ञान बांटने वाले सूरज चौधरी का विवादों से घिरा चेहरा अब चर्चा के केंद्र में है। पत्रकारों को बदनाम करने और अपने ऊपर उठ रहे सवालों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए फेसबुक पर स्क्रीनशॉट साझा कर सहानुभूति बटोरने की कोशिश करने वाले इस किरदार की कार्यशैली पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि निजी और व्यावसायिक प्रचार के लिए न्यूज़ पोर्टल पर महीनों तक विज्ञापन चलवाए गए, लेकिन भुगतान की बारी आई तो फोन उठाना और संदेशों का जवाब देना तक बंद कर दिया गया। गिरगिट भी शायद इतनी तेजी से रंग नहीं बदलता, जितनी तेजी से इस पूरे घटनाक्रम में रवैये बदलने के आरोप सामने आए हैं। सवाल साफ है—जब प्रचार कराना था, तब पोर्टल की जरूरत थी, लेकिन भुगतान की बारी आई तो संपर्क से दूरी क्यों? विज्ञापन के नाम पर प्रचार कराना और फिर भुगतान को लेकर सवाल उठने पर पत्रकारों को ही बदनाम करने की कोशिश करना किस तरह की समाजसेवा है? याद रहे, विज्ञापन के चंद रुपयों से पत्रकार की कलम नहीं खरीदी जा सकती और न ही किसी व्यक्ति को यह अधिकार मिल जाता है कि वह अपनी मर्जी के मुताबिक खबरें प्रकाशित करवाए या अपने खिलाफ उठने वाले सवालों को दबा दे।
मामला केवल विज्ञापन के भुगतान तक सीमित नहीं है। पुलिस को दिए गए शिकायती पत्रों और संबंधित दस्तावेजों में ठेकेदार से कथित अवैध वसूली, रंगदारी और दस हजार रुपये मांगने जैसे गंभीर आरोपों का भी जिक्र है। सूरज चौधरी के भाई विपिन चौधरी को लेकर भी हत्या के मामले में सजा काटने और गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई किए जाने का रिकॉर्ड होने के दावे सामने आए हैं। इन घटनाक्रमों ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। सवाल यह है कि जब व्यावसायिक लेन-देन और कथित वसूली जैसे मामलों को लेकर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब तथ्यों के साथ देने के बजाय पत्रकारों की निष्पक्षता पर हमला क्यों किया जाता है? क्या विज्ञापन चलवाने का मतलब यह है कि पत्रकार संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कोई खबर प्रकाशित ही न करें? क्या भुगतान मांगना अपराध है और सवाल पूछना पत्रकारिता की गलती? पत्रकारिता किसी की निजी जागीर नहीं, जहां विज्ञापन के बदले सच को बंधक बना लिया जाए। जो लोग समाज के सामने आदर्शों की बातें करते हैं, उनकी कथनी और करनी पर सवाल उठना भी लोकतंत्र का हिस्सा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जवाबदेही का है। फेसबुक पर स्क्रीनशॉट साझा करके किसी को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश से न भुगतान का सवाल खत्म होता है और न ही शिकायतों से जुड़े मुद्दे गायब हो जाते हैं। यदि खबर पर आपत्ति है, तो तथ्य सामने रखे जाएं; यदि लेन-देन का विवाद है, तो उसका जवाब दिया जाए। लेकिन पत्रकारों को बदनाम करके सवालों से बच निकलने की रणनीति आखिर कब तक चलेगी? समाजसेवा का तमगा लगाने से कोई व्यक्ति सवालों से ऊपर नहीं हो जाता और सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी बातें लिखने भर से किसी का चरित्र प्रमाणित नहीं हो जाता। पत्रकार की कलम न विज्ञापन के दबाव में झुकेगी, न सोशल मीडिया की धमकियों से रुकेगी। जनता के मुद्दों पर सवाल उठाना और तथ्यों को सामने लाना ही पत्रकारिता का धर्म है। जो लोग विज्ञापन के सहारे कलम पर पहरा लगाने का सपना देखते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए—कलम बिकाऊ नहीं है, सवाल दबाए नहीं जा सकते और सच को सोशल मीडिया के शोर में दफन नहीं किया जा सकता।



