औपचारिकता में सिमटी कार्रवाई तराई पश्चिमी डिवीजन में लकड़ी माफिया बेखौफ, निशाने पर डीएफओ पुनीत तोमर की कुंठित निर्णय प्रक्रिया।
सलीम अहमद साहिल/अज़हर मलिक
जनपद ऊधम सिंह नगर और नैनीताल से सटा तराई पश्चिमी वन प्रभाग इन दिनों अवैध कटान और बेशकीमती लकड़ियों की तस्करी को लेकर सुर्खी बना हुआ है। सड़कों पर आए दिन रेंजरों और एसओजी की टीमों द्वारा की जा रही ताबड़तोड़ कार्रवाइयों का ढिंढोरा तो पीटा जा रहा है, लेकिन हकीकत में यह सब महज एक प्रशासनिक औपचारिकता और लीपापोती से ज्यादा कुछ नजर नहीं आता। सड़कों पर अवैध सामग्री से भरे वाहन और गिल्टे पकड़कर अपनी पीठ थपथपाने वाला वन विभाग उन असली माफियाओं की गिरेबान तक पहुँचने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है, जो बेखौफ होकर जंगलों का सीना चीर रहे हैं।
हाल ही में काशीपुर क्षेत्र से बरामद करीब 30 कुंतल खैर बरामद होने का मामला हो या फिर मालधन तुमाड़िया डैम क्षेत्र से पकडे गए 9 खैर के गिल्टो सहित ट्रैक्टर-ट्रैलियो को पकडे जाने कि विभागीय कार्रवाई सिर्फ गाड़ियों पर जब्ती और चालान तक सीमित रह गई है। इस पूरी लूट के पीछे मुख्य जिम्मेदार डीएफओ पुनीत तोमर की शिथिल कार्यप्रणाली और ठोस फैसलों की कमी अब खुलकर उजागर हो रही है। लकड़ी तस्करों के हौसले पस्त करने के लिए जिस कड़े प्रशासनिक इकबाल और सख्त रुख की दरकार थी, उसका तराई पश्चिमी डिवीजन में पूरी तरह अभाव दिखाई दे रहा है। माफिया खुलेआम जंगलों को खोखला कर रहे हैं और अधिकारी कुंभकर्णी नींद में सोए हुए हैं।
तस्करी के इन मामलों में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि आखिर यह बेशकीमती माल किन जंगलों से काटा गया और कौन से ब्लॉक के कर्मचारियों की नाक के नीचे से यह बाहर निकल आया? चौकाने वाली बात यह है कि डीएफओ पुनीत तोमर की तरफ से अब तक न तो किसी जिम्मेदार वन कर्मचारी या अधिकारी पर कोई सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है और ना ही किसी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन की जानकारी मीडिया को दी है आखिर विभाग अपनी काली भेड़ों की जांच किस स्तर पर कर रहा है, जिससे अंदरूनी साठगांठ की बू और भी गहरी हो जाती है।
वर्तमान में तराई पश्चिमी प्रभाग में वन कर्मचारियों और लकड़ी तस्करों के बीच सिर्फ ‘चोर-पुलिस’ का एक छलावा भरा खेल खेला जा रहा है। जंगलों से बेधड़क पेड़ काटे जाते हैं और अगर गलती से सड़क पर माल पकड़ा भी गया, तो केवल नाममात्र का जुर्माना लगाकर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालकर रफा-दफा कर दिया जाता है। तस्करों के मन से कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है और वे यह मान बैठे हैं कि पूर्व डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य का सख्त दौर बीत चुका है। यदि डीएफओ पुनीत तोमर ने अपनी इस कुंठित निर्णय प्रक्रिया को छोड़कर माफियाओं और भ्रष्ट कर्मचारियों के खिलाफ कोई बड़ा और कड़ा कदम नहीं उठाया, तो तराई पश्चिमी के जंगलों का वजूद पूरी तरह मिटने की कगार पर पहुँच जाएगा।



