अभिभावकों की शिकायत के सहारे लाचार शिक्षा विभाग! निजी स्कूलों की मनमानी पर खंड शिक्षा अधिकारी धीरेंद्र सिंह साहू का टालमटोल भरा रवैया, आखिर शिक्षा माफियाओं पर क्यों मेहरबान हैं जिम्मेदार?
अज़हर मलिक
उत्तराखंड में निजी विद्यालयों की तानाशाही और अभिभावकों के उत्पीड़न का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है, लेकिन कार्रवाई करने के बजाय शिक्षा विभाग अपनी आंखें मूंदे बैठा है। हालिया मामला काशीपुर स्थित इक ओंकार ग्लोबल एकेडमी का है, जहाँ छात्रों को परीक्षा में बैठने से रोकने और अन्य अनियमितताओं का विरोध करते हुए जब छात्र संघ के प्रतिनिधि खंड शिक्षा अधिकारी के पास ज्ञापन देने पहुँचे, तो विभाग की गैर-जिम्मेदाराना कार्यशैली खुलकर सामने आ गई। मीडिया से बातचीत के दौरान खंड शिक्षा अधिकारी धीरेंद्र सिंह साहू ने यह स्वीकारा कि नियमतः फीस के अभाव में किसी भी बच्चे को परीक्षा से वंचित नहीं रखा जा सकता और इस संबंध में कड़े निर्देश जारी हैं। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अपनी लाचारी व्यक्त करते हुए तर्क दिया कि अभी तक अभिभावकों की ओर से इस मामले में न तो कोई सूचना दी गई है और न ही कोई लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है।
खंड शिक्षा अधिकारी के इस बयान ने शिक्षा विभाग की निष्पक्षता और कर्तव्यों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। क्या निजी स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए शिक्षा विभाग केवल कागजी शिकायतों का इंतजार करेगा? अगर पीड़ित अभिभावक डर या संकोचवश लिखित शिकायत नहीं दे पाते, तो क्या विभाग के पास स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लेने या स्वयं जांच करने की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या शिक्षा विभाग केवल लाठी और आंदोलन के सहारे ही अपनी नींद से जागेगा? जमीनी स्तर पर स्कूलों की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखने का जो अधिकार और दायित्व विभाग को मिला है, उसका पालन करने के बजाय शिकायतों का बहाना बनाना सरासर प्रशासनिक पल्ला झाड़ने जैसा है।
हैरानी की बात तो यह है कि कार्रवाई की बात कहने के बजाय जिम्मेदार अधिकारी इस निजी एकेडमी की वकालत करते और उनके कसीदे पढ़ते नजर आए। अधिकारी महोदय ने खुद मीडिया के सामने दावा किया कि स्कूल में लगभग 367 बच्चे ऐसे हैं जो बिना फीस जमा किए परीक्षा दे रहे हैं। बिना किसी निष्पक्ष विभागीय जांच के, सीधे निजी स्कूल प्रबंधन के दिए गए आंकड़ों और तर्कों को मीडिया के सामने दोहराना यह साफ दर्शाता है कि अधिकारी किस हद तक निजी संस्थानों के प्रभाव में हैं। इसके अलावा, जब मामले की त्वरित जांच की बात आई, तो जांच रिपोर्ट का समय भी 5 दिन से बढ़ाकर 7 दिन बता दिया गया, जिससे साफ जाहिर होता है कि मामले को केवल समय बिताकर ठंडे बस्ते में डालने की मंशा है।
यह पूरा घटनाक्रम यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर अधिकारियों को इन निजी विद्यालयों से इतना विशेष लगाव क्यों है? जब जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में निरीक्षण के नाम पर औचक निरीक्षण की टीमें गठित की जाती हैं, तो क्या काशीपुर में संचालित हो रहे सभी निजी स्कूल शासन के तय मानकों पर खरे उतर रहे हैं? क्या काशीपुर का कोई भी निजी स्कूल नियमों का उल्लंघन नहीं कर रहा, या फिर संबंधित विभाग के अधिकारी जानबूझकर इन माफियाओं की मनमानी से आंखें मूँदे बैठे हैं? बाल अधिकार संरक्षण आयोग और जिला शिक्षा विभाग जैसे उच्च प्रशासनिक तंत्रों की मौजूदगी के बावजूद, स्थानीय खंड शिक्षा अधिकारी का ऐसा बयान यह सिद्ध करता है कि आम जनता और छात्रों के अधिकारों की रक्षा करने वाला विभाग खुद लाचार और मेहरबान बना हुआ है।



