डी.एफ.ओ साहब कुर्सी से नहीं दिखता गुलदार का आतंक, जमीनी हकीकत खौफ कि गवाह। डी.एफ.ओ साहब मौन… गुलदार के आतंक पर कंट्रोल करे कौन?
अज़हर मालिक / सलीम अहमद साहिल
तराई पश्चिमी डिवीजन में गुलदार का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है… आबादी के आसपास गुलदारों की लगातार मूवमेंट ने ग्रामीणों की नींद उड़ा रखी है… शाम होते ही गांवों में सन्नाटा पसरने लगता है और ग्रामीण अपने ही घरों से बाहर निकलने में डरने लगे हैं… लेकिन इस पूरे हालात के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—आखिर वन विभाग के मुखिया डीएफओ पुनीत तोमर कहां हैं?
तराई पश्चिमी डिवीजन का चार्ज संभालने के बाद डीएफओ पुनीत तोमर ने अभी तक क्षेत्र की जनता के बीच जाकर वन्यजीवों के आतंक से जूझ रहे ग्रामीणों का दर्द और परेशानी को सुनने कि जहमत नहीं उठाई है। जनता भले ही वन्यजीवों के आतंक से त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही हो, लेकिन आरोप है कि डीएफओ साहब के पास जनता के लिए अभी तक वक्त नहीं है।
डीएफओ साहब अपने एयर कंडीशन ऑफिस में बैठकर अपने अधीनस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों को जंगल बचाने और वन्यजीव संघर्ष रोकने के निर्देश जारी कर रहे हो , लेकिन सवाल यह है कि जिस वन्यजीव संघर्ष की हकीकत गांवों में दिखाई दे रही है, उसे देखने के लिए डीएफओ साहब खुद जमीन पर कब उतरेंगे?
क्या वन्यजीव संघर्ष सिर्फ फाइलों, बैठकों और आदेशों का विषय बनकर रह गया है?
क्योंकि फाइलों में गुलदार सिर्फ एक आंकड़ा हो सकता है, लेकिन गांव में घूमता गुलदार किसी परिवार के लिए मौत का डर बन जाता है।
वन्यजीव पीड़ितों और आम जनता की समस्याएं सुनने के लिए मौके पर पहुंचना भी जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही का हिस्सा है। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी शिकायतों के बावजूद जमीनी स्तर पर वह प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही है।
तराई पश्चिमी डिवीजन की पतरामपुर रेंज के ग्रामीण क्षेत्र मालधन चौड़, तुमड़िया डैम और मोहननगर में गुलदार जमकर आतंक मचा रहा है। हालात इतने डरावने हो चुके हैं कि शाम होते ही ग्रामीण अपने घरों से निकलने में भी घबरा रहे हैं। गुलदार लगातार ग्रामीणों के मवेशियों को अपना निवाला बना रहे हैं और अब ग्रामीणों में वन विभाग के प्रति रोष भी बढ़ता जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि उनके द्वारा लगातार वन विभाग को सूचना दी जा रही है कि गुलदार आबादी में घुसकर मवेशियों को अपना निवाला बना रहा है। ग्रामीण गुलदार को पकड़ने के लिए पिंजरा लगाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनका आरोप है कि इसके बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो रही।
सवाल यह है कि वन विभाग आखिर किस घटना का इंतजार कर रहा है?
क्या किसी इंसान के घायल होने या किसी बड़ी अप्रिय घटना के बाद ही विभाग की नींद टूटेगी?
ग्रामीणों के मुताबिक क्षेत्र में कई गुलदार लगातार घूम रहे हैं। अगर वक्त रहते वन विभाग ने ठोस कदम नहीं उठाया तो वह दिन दूर नहीं, जब मवेशियों के बाद गुलदार इंसानों को भी निशाना बना सकते हैं।
आज गुलदार मवेशियों की जान ले रहा है कल किसी इंसानी जिंदगी पर हमला हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि वन्यजीव की आबादी में लगातार मौजूदगी और इंसानों के बीच बढ़ता संघर्ष किसी एक दिन की समस्या नहीं है। यह खतरे की वह दस्तक है, जिसे समय रहते सुनना जरूरी है।
ताजा मामला बीती रात का है, जब गुलदार ने तुमड़िया डैम सेकेंड निवासी पीड़ित प्रीतम सिंह की गाय को अपना निवाला बना लिया। ऐसा नहीं है कि गुलदार ने पहली बार किसी ग्रामीण के मवेशी को अपना शिकार बनाया हो। इससे पहले भी गुलदार ग्रामीणों के मवेशियों पर हमला कर अपना निवाला बना चुके हैं।
घटनाएं सामने आ रही हैं… ग्रामीण लगातार शिकायत कर रहे हैं गुलदार की मूवमेंट लगातार बनी हुई है मवेशी लगातार निशाना बन रहे हैं और दूसरी तरफ जवाबदेही के कटघरे में वन विभाग खड़ा है।
डीएफओ साहब… सवाल सिर्फ एक गाय के मारे जाने का नहीं है। सवाल उस डर का है, जो आज हर उस परिवार के घर में पहुंच चुका है, जिसके आसपास गुलदार घूम रहा है।
सवाल यह भी है कि अधिकारी दफ्तर में बैठकर जंगल और वन्यजीव संघर्ष को समझेंगे या कभी ग्रामीणों के बीच जाकर उस डर को महसूस भी करेंगे?
क्योंकि एसी कमरे में बैठकर जारी किए गए आदेशों और जमीन पर खड़े होकर उठाए गए कदमों के बीच बहुत बड़ा फर्क होता है। और वन विभाग को अब यह तय करना होगा कि गुलदार के अगले हमले का इंतजार किया जाएगा या उससे पहले कोई प्रभावी कदम उठाया जाएगा।



