फर्जी जाति प्रमाणपत्र मामला: बाजपुर तहसील की ‘कुंभकर्णी नींद’ पर खड़े हुए तीखे सवाल, 2024 में आंखें बंद कर पास किया और 2026 में जागी अंतरात्मा!

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फर्जी जाति प्रमाणपत्र मामला: बाजपुर तहसील की ‘कुंभकर्णी नींद’ पर खड़े हुए तीखे सवाल, 2024 में आंखें बंद कर पास किया और 2026 में जागी अंतरात्मा!

अज़हर मलिक

बाजपुर तहसील में फर्जी जाति प्रमाणपत्रों का एक और बड़ा और चौंकाने वाला मामला उजागर हुआ है, जिसने पूरी प्रशासनिक कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। मुण्डिया पिस्तौर निवासी फाजिल पुत्र तौफिक अहमद के नाम 28 दिसंबर 2024 को जारी हुए जाति प्रमाणपत्र (संख्या

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  • UK24E50800351***) को जांच में कूटरचित दस्तावेज (फर्जी गृहकर रसीद) मिलने के बाद निरस्त कर दिया गया है। मामले में राजस्व उपनिरीक्षक जानकी प्रसाद द्विवेदी की ओर से कोतवाली बाजपुर में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए तहरीर दी गई है और जांच में यह भी सामने आया है कि इस प्रमाणपत्र को बनवाने के लिए ‘रवि’ नाम के एक व्यक्ति को 6,000 रुपये दिए गए थे। यकीनन कूटरचना करने वालों पर कार्रवाई होनी ही चाहिए, लेकिन इस पूरी कार्रवाई के बीच सबसे बड़ा सवाल खुद तहसील प्रशासन और उस संबंधित पटवारी (राजस्व उपनिरीक्षक) पर आकर टिक गया है जिन्होंने 2024 में इस आवेदन को हरी झंडी दी थी। आखिर 2024 में जब इस प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया गया था, तब जांच अधिकारी और हलका पटवारी की आंखें, उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारी और दस्तावेज सत्यापन की प्रणाली कहां सोई हुई थी?

यह महज एक प्रमाणपत्र निरस्त करने का मामला नहीं है, बल्कि यह बाजपुर तहसील की उस लचर और संदिग्ध प्रणाली की पोल खोलता है जहां पैसों के लेनदेन से लेकर फर्जी कागजों पर आंख मूंदकर सरकारी मुहर लगा दी जाती है। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि जो गृहकर रसीद आज 2026 में आकर अचानक ‘कूटरचित’ और फर्जी साबित हो गई, वही रसीद 2024 में आवेदन के समय वैध कैसे मान ली गई? उस वक्त किस जादुई चश्मे से फाइल को देखा गया था कि फर्जीवाड़ा पकड़ में ही नहीं आया? क्या 2024 में पटवारी द्वारा बिना किसी भौतिक सत्यापन और निष्पक्ष जांच के सिर्फ मेज के नीचे से फाइल आगे खिसका दी गई थी? आखिर 2026 में आकर प्रशासन को ऐसा कौन सा सपना आ गया, कौन सी संजीवनी मिल गई या ऐसी कौन सी अंतरात्मा जाग उठी कि दो साल पुराने बने-बनाए प्रमाणपत्र की जांच की याद आई? जो घालमेल आज इतने सालों बाद पकड़ में आ रहा है, वह उस दिन क्यों नहीं पकड़ा गया जिस दिन पटवारी और जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी आईडी से इसे स्वीकृत किया था?

आखिर बाजपुर तहसील में ही बार-बार इस तरह के फर्जी प्रमाणपत्रों के जिन्न क्यों बाहर निकल रहे हैं? क्यों बार-बार बाजपुर ही ऐसे मामलों का गढ़ बनता जा रहा है? तहसील प्रशासन आज तहरीर देकर और एफआईआर की औपचारिकता निभाकर अपनी गर्दन बचाने की कोशिश भले ही कर ले, लेकिन सच तो यह है कि फर्जी कागजों को सरकारी व्यवस्था में प्रवेश दिलाने के असली गुनहगार वे जिम्मेदार अधिकारी और पटवारी हैं जिन्होंने अपनी लॉगिन आईडी और हस्ताक्षर से इसे पास किया था। क्या बाजपुर का तहसील प्रशासन सिर्फ बाहरी दलालों पर कार्रवाई का ढोंग रचता रहेगा या उन अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होगी जिनकी लापरवाही और शह के बिना 2024 में यह महा-फर्जीवाड़ा सिरे ही नहीं चढ़ सकता था? जनता अब प्रशासन से कागजी बयानों का नहीं, बल्कि इस ‘कुंभकर्णी नींद’ और दोहरे रवैये का कठोर जवाब मांग रही है।

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