विदेश भेजने के नाम पर ठगी का शिकार हो रहे मासूम, मानकों की अनदेखी पर प्रशासन क्यों मौन?
अज़हर मलिक
काशीपुर और आसपास के क्षेत्रों में विदेश जाकर रोजगार कमाने की चाहत रखने वाले सीधे-साधे और गरीब लोग लगातार धोखाधड़ी का शिकार हो रहे हैं। एक आम नागरिक अपनी मेहनत की कमाई, गाढ़ी कमाई का पैसा, किसी से भारी ब्याज पर कर्ज लेकर या घर-जमीन गिरवी रखकर इस उम्मीद में एजेंटों को सौंप देता है कि विदेश जाकर उसके परिवार की तकदीर बदल जाएगी। लेकिन कई मामलों में देखा जा रहा है कि लाखों रुपये ऐंठने के बावजूद न तो लोगों को सही नौकरी मिल पा रही है और न ही धोखाधड़ी के शिकार होने के बाद उनका पैसा रिफंड किया जा रहा है। विदेश पहुंचने के बाद जब लोगों को पता चलता है कि उनके साथ छल हुआ है, तो उनके और उनके परिवार के पास पछतावे और पाई-पाई के मोहताज होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि शहर में संचालित हो रहे इन वीजा सेंटरों, ट्रैवल एजेंसियों और विदेश भेजने वाले दफ्तरों में से कौन नियमानुसार लाइसेंस धारक है और कौन सरकारी मानकों को ताक पर रखकर अवैध रूप से अपनी दुकानें चला रहा है? इतना ही नहीं, यह भी जांच का विषय है कि क्या कुछ लाइसेंस धारक या नियमों का दावा करने वाले लोग भी कागजों की आड़ में आम जनता के साथ ठगी और वादाखिलाफी का खेल खेल रहे हैं? आम नागरिक के लिए यह पहचान पाना मुमकिन नहीं होता कि कौन सही है और कौन गलत, लेकिन इस अनिश्चितता का खामियाजा गरीब परिवारों को भुगतना पड़ रहा है।
ऐसे में जिला प्रशासन, स्थानीय पुलिस और संबंधित विभागों का यह नैतिक और कानूनी दायित्व बनता है कि वे तुरंत नींद से जागें और शहर के सभी वीजा व एम्प्लॉयमेंट कंसल्टेंसी दफ्तरों का व्यापक निरीक्षण अभियान चलाएं। हर छोटे-बड़े दफ्तर की बारीकी से चेकिंग की जाए, उनके रजिस्ट्रेशन, विदेश मंत्रालय के लाइसेंस और पिछले रिकॉर्ड को खंगाला जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। जो नियमों की आड़ में या बिना लाइसेंस के लोगों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं, उन पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और पीड़ितों का पैसा वापस कराया जाए, जिससे कि किसी और गरीब की जिंदगी तबाह होने से बचाई जा सके।



