बेबाक अदाकारी और अनूठी शैली के एक स्वर्णिम अध्याय पर लगा पूर्णविराम: नाना पाटेकर के निधन से कला जगत स्तब्ध
अपनी सहज भाव-भंगिमा, तीखे तेवरों और संवाद अदायगी के अलग अंदाज़ से भारतीय सिनेमा को नए आयाम देने वाले महान कलाकार नाना पाटेकर (75) का अचानक निधन हो गया है। कार्डियक अरेस्ट की वजह से हुए इस दुखद हादसे की खबर फैलते ही पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। उन्होंने मुख्यधारा की व्यावसायिक फिल्मों से लेकर यथार्थवादी सिनेमा तक अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘तिरंगा’, ‘अग्नि साक्षी’ और ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ जैसी फिल्मों में उनके द्वारा निभाए गए किरदार आज भी अभिनय की पाठशाला माने जाते हैं। उन्होंने साबित किया कि बड़े पर्दे पर किसी कलाकार की पहचान उसकी चमक-धमक से नहीं, बल्कि उसके काम के प्रति समर्पण और संवादों की गहराई से बनती है।
फिल्मी दुनिया की जगमगाहट से अलग नाना पाटेकर का व्यक्तित्व ज़मीन और जन-सरोकारों से गहराई से जुड़ा हुआ था। वे उन गिने-चुने कलाकारों में से थे, जिन्होंने पर्दे के पीछे की जिंदगी को भी उतनी ही संजीदगी से जिया। ‘नाम फाउंडेशन’ के माध्यम से सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों और ज़रूरतमंदों की निस्वार्थ मदद करके उन्होंने असल जिंदगी में भी एक नायक की मिसाल पेश की। उनके चले जाने से भारतीय फिल्म उद्योग ने न सिर्फ एक बेहतरीन अभिनेता खोया है, बल्कि समाज ने एक संवेदनशील और खरा इंसान भी खो दिया है। उनकी अदाकारी की अमिट यादें और समाज सेवा की मिसालें आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहेंगी।



