कार्यालय से गांव तक संवाद, समस्याओं पर कार्रवाई; DFO प्रकाश चंद्र आर्य की कार्यशैली चर्चा में। वन्यजीव संरक्षण और किसान हितों के बीच संतुलन की शानदार पहल।

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कार्यालय से गांव तक संवाद, समस्याओं पर कार्रवाई; DFO प्रकाश चंद्र आर्य की कार्यशैली चर्चा में। वन्यजीव संरक्षण और किसान हितों के बीच संतुलन की शानदार पहल।

                सलीम अहमद साहिल 

 

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बागेश्वर। पहाड़ों में खेती करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। मौसम की बेरुखी, दुर्गम रास्तों की चुनौतियां और जंगली जानवरों का फसलों पर हमला—इन तमाम मुश्किलों से जूझकर पहाड़ का किसान अपनी आजीविका खड़ी करता है। खेतों कि फसलों में दिन-रात बहाया गया पसीना जब बंदरों के झुंड चंद पलों में उजाड़ देते हैं, तो नुकसान केवल फसल का नहीं होता, बल्कि किसान की उम्मीदों और परिवार की रोजी-रोटी पर भी चोट पड़ती है। लेकिन अब किसानों की इसी पीड़ा को समझते हुए बागेश्वर वन प्रभाग ने बंदरों के रेस्क्यू अभियान के जरिए राहत पहुंचाने की पहल तेज कर दी है।

 

 

ग्रामीणों की समस्या को कार्रवाई में बदलने की पहल।

 

 

बागेश्वर वन प्रभाग में प्रभागीय वन अधिकारी प्रकाश चंद्र आर्य के नेतृत्व और मार्गदर्शन में किसानों की फसलों को बंदरों से बचाने तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उद्देश्य से विभिन्न क्षेत्रों में रेस्क्यू अभियान चलाया गया। इस अभियान के तहत पीडब्ल्यूडी कठायतवाड़ा से 62, ग्राम पंचायत पगना से 16 और ढोलगांव, गरुड़ क्षेत्र से 54 बंदरों का रेस्क्यू किया गया। इस तरह कुल 132 बंदरों को सफलतापूर्वक रेस्क्यू कर रानीबाग रेस्क्यू सेंटर भेजा गया।

 

 

 

यह कार्रवाई उन ग्रामीणों के लिए राहत की उम्मीद बनकर सामने आई है, जो लंबे समय से बंदरों के आतंक और फसलों को हो रहे नुकसान से परेशान थे। वन विभाग की इस पहल का उद्देश्य केवल बंदरों को पकड़ना नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत की रक्षा करना, ग्रामीणों की परेशानियों को कम करना और इंसान तथा वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में काम करना है।

 

 

बागेश्वर वन प्रभाग की कमान संभालने के बाद से ही DFO प्रकाश चंद्र आर्य की कार्यशैली में जनता के बीच पहुंचकर उनकी समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए प्रयास करने पर जोर दिखाई देता है। मानव-वन्यजीव संघर्ष हो या जंगली जानवरों से फसलों को पहुंचने वाला नुकसान, ग्रामीणों की रोजमर्रा की चुनौतियों को सुनना और संबंधित मामलों में कार्रवाई की पहल करना उनकी कार्यशैली का अहम हिस्सा बनकर सामने आया है।

 

 

किसी भी अधिकारी की असली पहचान केवल उसके पद या कार्यालय से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि आम आदमी अपनी परेशानी लेकर उसके पास कितनी सहजता से पहुंच सकता है और उसकी समस्या पर कितनी गंभीरता से सुनवाई होती है। इसी कसौटी पर प्रकाश चंद्र आर्य की जनता के बीच सक्रियता और समस्याओं के समाधान के लिए किए जा रहे प्रयास चर्चा में हैं।

 

 

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, प्रकाश चंद्र आर्य के कार्यभार संभालने के बाद से वे अपनी समस्याओं को लेकर वन विभाग के अधिकारियों तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं और उन्हें अपनी बात रखने का अवसर मिल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जब वे अपनी समस्याएं लेकर DFO के पास जाते हैं, तो उनकी बात सुनी जाती है और समाधान के लिए आवश्यक निर्देश देने की पहल की जाती है।

 

ग्रामीणों के मुताबिक, अधिकारी से बातचीत के दौरान उन्हें ऐसा महसूस नहीं होता कि वे किसी दूर बैठे प्रशासनिक अधिकारी के सामने अपनी फरियाद रख रहे हैं, बल्कि उन्हें अपने परिवार के किसी सदस्य की तरह सहजता से बात रखने का अवसर मिलता है। जनता की यह प्रतिक्रिया अधिकारी और ग्रामीणों के बीच बनते भरोसे तथा संवाद की अहमियत को रेखांकित करती है।

 

 

वन्यजीव संरक्षण के साथ किसानों की आजीविका बचाने की चुनौती।

 

 

हालांकि, पहाड़ों में मानव-वन्यजीव संघर्ष का समाधान केवल एक अभियान तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए निरंतर निगरानी, प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, ग्रामीणों की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई और वन्यजीवों के संरक्षण के अनुरूप दीर्घकालिक रणनीति भी जरूरी है। ऐसे में बागेश्वर वन प्रभाग की यह पहल किसानों को तत्काल राहत देने के साथ-साथ भविष्य में इस समस्या से निपटने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है।

 

DFO प्रकाश चंद्र आर्य के नेतृत्व में चलाया गया यह अभियान एक अहम संदेश देता है कि जब विभागीय कार्रवाई का केंद्र जनता की वास्तविक समस्याएं बनती हैं, तो सरकारी तंत्र और ग्रामीणों के बीच भरोसे की जमीन मजबूत होती है।

 

फिलहाल 132 बंदरों का रेस्क्यू किसानों की फसलों की सुरक्षा और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की दिशा में बागेश्वर वन प्रभाग की एक महत्वपूर्ण पहल है। अब इस प्रयास की निरंतरता और जमीनी असर पर सबकी नजर रहेगी, ताकि पहाड़ का किसान अपनी मेहनत से उगाई फसल को सुरक्षित देख सके और वन्यजीव संरक्षण का उद्देश्य भी प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सके।

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