तराई पश्चिमी वन प्रभाग से लेकर हरिद्वार तक खूनी फंदे और जहर का नंगा नाच: कॉर्बेट के मुहाने पर वन्यजीवों की सुनियोजित हत्याओं से दहल उठा सिस्टम, अंतरराष्ट्रीय तस्करी के बड़े सिंडिकेट पर कब शिकंजा कसेगा?

Advertisements

तराई पश्चिमी वन प्रभाग से लेकर हरिद्वार तक खूनी फंदे और जहर का नंगा नाच: कॉर्बेट के मुहाने पर वन्यजीवों की सुनियोजित हत्याओं से दहल उठा सिस्टम, अंतरराष्ट्रीय तस्करी के बड़े सिंडिकेट पर कब शिकंजा कसेगा?

अज़हर मलिक

उत्तराखंड के जंगलों में वन्यजीवों की सुरक्षा के दावों की धज्जियां उड़ती जा रही हैं और महकमे की नाकामी अब किसी से छिपी नहीं है। ताजा सनसनीखेज मामला तराई पश्चिमी वन प्रभाग (रामनगर) के अंतर्गत आने वाले उदयपुरी बंदोबस्ती का है, जहां पवन मेहरा नामक व्यक्ति के खेत में एक गुलदार का फंदे में फंसकर तड़प-तड़पकर दम तोड़ देना यह चीख-चीख कर कह रहा है कि राज्य के जंगलों में बेखौफ घूम रहे शिकारी और तस्कर किस कदर हावी हो चुके हैं। तराई पश्चिमी वन प्रभाग के इस क्षेत्र में खेत में लगे मौत के फंदे ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि महकमे की गश्त और चौकसी सिर्फ कागजी फाइलों तक सीमित है, जबकि जमीन पर बेकसूर वन्यजीवों का शिकार धड़ल्ले से जारी है। यह कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि ठीक कुछ समय पहले हरिद्वार की श्यामपुर रेंज में दो युवा बाघ शावकों को सुनियोजित तरीके से जहर देकर मौत के घाट उतारने और उनके पंजे तक काट ले जाने का सनसनीखेज मामला सामने आ चुका है, जो यह बताने के लिए काफी है कि उत्तराखंड के आरक्षित और संरक्षित वन क्षेत्रों में किस कदर खूनी खेल चल रहा है।

हरिद्वार से लेकर तराई पश्चिमी वन प्रभाग के जंगलों तक पैठ बना चुके इन अंतरराष्ट्रीय और अंतरराज्यीय तस्करों के नेटवर्क के आगे वन विभाग पूरी तरह लाचार नजर आ रहा है, जहाँ कभी लोहे और क्लच वायर के फंदों में फंसाकर तो कभी जहर देकर बाघ और गुलदार जैसे दुर्लभ वन्यजीवों का खात्मा किया जा रहा है। रामनगर के उदयपुरी बंदोबस्ती में हुई गुलदार की मौत के मामले में भले ही खेत मालिक को हिरासत में लेकर जांच के ढोल पीटे जा रहे हों, लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर तराई पश्चिमी डिविजन के बफर जोन और खेतों के इर्द-गिर्द इस तरह के जानलेवा फंदे बिछाने वालों तक महकमे की नजर पहले क्यों नहीं पहुंचती? जब तक वन्यजीव तस्करों और शिकारियों के इस नापाक गठजोड़ पर बुलडोजर जैसी सख्त कार्रवाई नहीं होती और जिम्मेदार वन अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक उत्तराखंड के इन जंगलों में मूक पशुओं का यूं ही कत्लेआम होता रहेगा और विभाग सिर्फ लीपापोती करने तक सीमित रह जाएगा।

Advertisements
Advertisements
THE GREAT NEWS

THE GREAT NEWS

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Translate »