आमपोखरा में जंगल की चौखट पर जागरूकता की दस्तक,जंगल की हिफाजत और इंसानी जिंदगी की सुरक्षा. पूरन सिंह खानायत और होमेश्वर सिंह की दोहरी जंग।
सलीम अहमद साहिल
उत्तराखंड में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष अब महज वन विभाग की चुनौती नहीं, बल्कि जंगलों की सीमा से सटे गांवों में रहने वाले हजारों ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल बनता जा रहा है। जैसे-जैसे जंगल और आबादी के बीच दूरी घट रही है, वैसे-वैसे वन्यजीवों की इंसानी बस्तियों में आवाजाही की आशंका भी बढ़ रही है। खासकर गुलदार की लगातार बढ़ती चहलकदमी ने ग्रामीणों की चिंता और वन विभाग की चुनौती दोनों बढ़ा दी हैं।
आमपोखरा रेंज की भौगोलिक परिस्थितियां इस चुनौती को और गंभीर बनाती हैं। रेंज के जंगलों से सटे कई गांव और खत्ते हैं, जहां रहने वाले ग्रामीण अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जंगल और उसके आसपास के इलाकों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में इंसान और वन्यजीव का आमना-सामना होने की आशंका हमेशा बनी रहती है।
इसी चुनौती के बीच रेंजर पूरन सिंह खानायत और फॉरेस्ट गार्ड होमेश्वर सिंह अपनी टीम के साथ वन्यजीव संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। मकसद साफ है—वन्यजीवों की सुरक्षा भी हो और जंगल की सीमा पर रहने वाले ग्रामीणों की जिंदगी भी सुरक्षित रहे।

इसी कड़ी में 4 अक्टूबर 2026 को वन्य प्राणी सप्ताह 2026 के तृतीय दिवस के अवसर पर आमपोखरा रेंज के अंतर्गत दक्षिणी आमपोखरा बीट की 64 गेट वन चौकी में ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के साथ जागरूकता गोष्ठी आयोजित की गई।
गोष्ठी में ग्रामीणों को सांप और गुलदार जैसे वन्यजीवों से बचाव, सावधानी और उनके व्यवहार के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई। विशेष रूप से सर्पदंश की स्थिति में तत्काल चिकित्सीय उपचार लेने, विषैले और गैर-विषैले सांपों की सामान्य पहचान तथा सर्पदंश से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने पर जोर दिया गया।
वन विभाग की ओर से ग्रामीणों को यह भी समझाया गया कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को केवल वन्यजीवों को खदेड़कर या पकड़कर खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए ग्रामीणों की जागरूकता, सावधानी, वन्यजीवों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण और विभाग-जनता के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
गोष्ठी में ग्रामीणों ने भी अपनी जमीनी समस्याएं खुलकर सामने रखीं। वन सीमा से लगे गांवों में कचरा और अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर विभाग और ग्रामीणों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता बताई गई। ग्रामीणों का कहना था कि आबादी के आसपास खुले में कचरा पड़ा रहने से वन्यजीवों के गांवों की ओर आकर्षित होने की आशंका बढ़ सकती है, इसलिए इस समस्या पर गंभीरता से काम किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने वन सीमा से सटे इलाकों में सोलर फेंसिंग, हाथी दीवार तथा रात के समय पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था किए जाने की मांग भी रखी, ताकि वन्यजीवों की आवाजाही वाले संवेदनशील क्षेत्रों में मानव सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।
वहीं गुलदार से वन्यजीव संघर्ष और नीलगाय से फसल क्षति का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। ग्रामीणों ने बताया कि वन्यजीवों की मौजूदगी और फसल नुकसान का सीधा असर उनकी आजीविका पर पड़ रहा है। ऐसे में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के साथ-साथ किसानों की फसल और आजीविका की सुरक्षा भी जरूरी है।
दरअसल, मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता टकराव किसी एक दिन या एक घटना का परिणाम नहीं है। जंगलों से सटे गांवों में बढ़ती आबादी, जंगल पर ग्रामीणों की निर्भरता, कचरा प्रबंधन की चुनौती, वन्यजीवों के बदलते व्यवहार और फसल नुकसान जैसे कई कारण इस समस्या को लगातार जटिल बना रहे हैं।
ऐसे हालात में आमपोखरा रेंज में आयोजित यह गोष्ठी सिर्फ जागरूकता कार्यक्रम भर नहीं, बल्कि जंगल और गांव के बीच बढ़ती दूरी को संवाद के जरिए कम करने की एक कोशिश के तौर पर देखी जा रही है। अब असली चुनौती यह है कि बैठक में उठे ग्रामीणों के सुझाव और मांगें कितनी तेजी से जमीन पर उतरती हैं।
क्योंकि वन्यजीवों को बचाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी जंगल की सीमा पर रहने वाले इंसानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। वन संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन ही बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का स्थायी समाधान बनने की दिशा में सबसे बड़ा कदम हो सकता है।
राजन सिंह वन दरोगा, विपिन चंद्र जोशी वन दरोगा, प्रकाश चंद्र मठपाल ग्राम प्रधान, महेश चंद्र बूथ अध्यक्ष भाजपा, होमेश्वर सिंह वन आरक्षी, बलकार सिंह वन आरक्षी, सविता वन आरक्षी, अनामिका वन आरक्षी, निशा पठानिया वन आरक्षी, तालिब स्नेक रेस्क्यूअर मुकेश कुमार पीटी वाचर, चमन सिंह ग्रामीण,सुभाष,ग्रामीण, बिनोद ग्रामीण, सतीश सैनी, विपिन सैनी अनिल कुमार, आदि बड़ी संख्या मे ग्रामीण मौजूद रहे।



