बाघों की बादशाहत से संरक्षण की पाठशाला तक फांटो की दहाड़ से गांवों की चौपाल तक, वन्यजीव संरक्षण की नई कहानी लिख रही वन विभाग की टीम।
सलीम अहमद साहिल
फांटो टूरिस्ट जोन आज किसी पहचान का मोहताज नहीं है। जंगल की खूबसूरती, प्राकृतिक वातावरण और यहां आसानी से नजर आने वाले बाघ सैलानियों के आकर्षण का बड़ा केंद्र बने हुए हैं। देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी पर्यटक फांटो जोन पहुंचकर वन्यजीवों को करीब से निहारने और जंगल की रोमांचक दुनिया को महसूस करने पहुंचते हैं। बाघ का दीदार होते ही पर्यटकों के चेहरे पर दिखाई देने वाली खुशी और उत्साह इस जोन की लोकप्रियता की कहानी खुद बयां करता है।
फांटो जोन को कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंचाने में वन विभाग की टीम की मेहनत भी अहम मानी जा रही है। उत्तरी जसपुर रेंज के वन क्षेत्राधिकारी कृपाल सिंह बिष्ट और उनकी टीम जहां जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर लगातार प्रयासरत है, वहीं अब संरक्षण की इस मुहिम को जंगल से निकलकर गांवों तक पहुंचाया जा रहा है।

क्योंकि वन्यजीव संरक्षण की असली चुनौती सिर्फ जंगल की सीमा तक सीमित नहीं है। जंगल से सटे गांवों में जब गुलदार आबादी के आसपास दस्तक देता है, ग्रामीणों के मवेशियों को अपना शिकार बनाता है या इंसानी बस्तियों में उसकी चहलकदमी दिखाई देती है, तो ग्रामीण स्वाभाविक रूप से उसे खतरनाक और हिंसक वन्यजीव की नजर से देखने लगते हैं। यही मानव-वन्यजीव संघर्ष संरक्षण के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरता है।

इसी धारणा को बदलने और ग्रामीणों तथा वन्यजीवों के बीच बेहतर समझ विकसित करने की दिशा में वन विभाग अब जागरूकता को हथियार बना रहा है। वन्यजीव प्राणी सप्ताह के तहत राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, शिवनाथपुर में स्कूली छात्र-छात्राओं को वन एवं वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के महत्व की जानकारी दी गई।

कार्यक्रम के दौरान निबंध और चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें बच्चों ने उत्साह के साथ भाग लिया। विद्यार्थियों ने अपनी कल्पनाओं को कागज पर उतारते हुए पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संदेश दिए।
वन क्षेत्राधिकारी कृपाल सिंह बिष्ट का कहना है कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं। अगर आज बच्चों को जंगल, पर्यावरण और वन्यजीवों के महत्व की जानकारी दी जाए और उनके भीतर संरक्षण की भावना पैदा की जाए, तो आने वाले समय में यही बच्चे वन और वन्यजीवों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
दरअसल, जंगल बचाने की लड़ाई सिर्फ जंगल के भीतर नहीं लड़ी जा सकती। जंगल से सटे गांवों में रहने वाले ग्रामीणों को संरक्षण की मुहिम से जोड़ना उतना ही जरूरी है। जब ग्रामीण वन्यजीवों के व्यवहार को समझेंगे और वन विभाग तथा ग्रामीणों के बीच भरोसा मजबूत होगा, तभी मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की दिशा में ठोस कदम आगे बढ़ सकेगा।
फांटो जोन में जहां एक ओर बाघ और दूसरे वन्यजीव पर्यटन को नई पहचान दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांवों में पहुंचकर बच्चों और ग्रामीणों को जागरूक करने की यह पहल बताती है कि वन्यजीव संरक्षण सिर्फ जंगल बचाने का अभियान नहीं, बल्कि जंगल और इंसान के बीच संतुलन कायम करने की भी लड़ाई है।
कार्यक्रम में वन क्षेत्राधिकारी कृपाल सिंह बिष्ट, उत्तरी जसपुर रेंज का समस्त स्टाफ और ग्रामीण मौजूद रहे।




