बागेश्वर की खूबसूरत वादियों में खुशहाली का नया सवेरा लाने की कोशिश, प्रकृति की विरासत और पहाड़ के लोगों के भविष्य को संवारने में जुटे DFO प्रकाश चंद्र आर्य।
सलीम अहमद साहिल
हिमालय की ऊंची चोटियां कल-कल बहती नदियों और हरे-भरे जंगलों के बीच बसा बागेश्वर अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक और प्राकृतिक विरासत के लिए दुनिया भर में पहचान रखता है। कत्यूरी और चंद राजवंशों की गौरवगाथा, भगवान बागनाथ की पावन नगरी, सरयू-गोमती का ऐतिहासिक संगम और वर्ष 1921 में सरयू बगड़ से उठी कुली-बेगार आंदोलन की क्रांतिकारी आवाज इस धरती के गौरवशाली अतीत की गवाही देती है। लेकिन पहाड़ की खूबसूरती के पीछे यहां के ग्रामीणों की जिंदगी का एक ऐसा संघर्ष भी छिपा है, जिसे दूर से देखने वाले अक्सर महसूस नहीं कर पाते। रोजगार के सीमित अवसर, पलायन का बढ़ता दबाव, खेतों में वन्यजीवों की दस्तक और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं पहाड़ के लोगों के सामने रोज नई मुश्किलें खड़ी करती हैं। जिस जमीन से उनका भावनात्मक रिश्ता पीढ़ियों पुराना है उसी जमीन पर अपनी आजीविका और परिवार का भविष्य सुरक्षित रखना आज उनके लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।

ऐसे चुनौतीपूर्ण हालात में बागेश्वर वन विभाग की जिम्मेदारी केवल जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा तक सीमित नहीं बल्कि प्रकृति और पहाड़ के लोगों के बीच संतुलन कायम करने की भी है। इसी सोच के साथ DFO प्रकाश चंद्र आर्य वन संरक्षण को जनजीवन की खुशहाली से जोड़कर जमीनी स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने जंगली जानवरों से ग्रामीणों की फसलों को होने वाले नुकसान की समस्या पर प्रभावी पहल करने और स्थानीय लोगों की परेशानियों को समझकर उनके समाधान की दिशा में काम करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। उनका प्रयास है कि जंगलों की सुरक्षा और ग्रामीणों की आजीविका एक-दूसरे के विरोध में खड़ी होने के बजाय एक-दूसरे की ताकत बनें। क्योंकि पहाड़ का किसान जब अपनी मेहनत से उगाई फसल को वन्यजीवों से बचाने के लिए रातभर जागता है, तो उसके साथ केवल एक खेत नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें भी जुड़ी होती हैं। ऐसे में वन विभाग की संवेदनशीलता और समय पर किए जाने वाले प्रयास ग्रामीणों के भीतर भरोसा जगाने की अहम कड़ी बन सकते हैं।

दरअसल, बागेश्वर की असली विरासत केवल उसके प्राचीन मंदिरों, ऐतिहासिक स्मारकों और प्राकृतिक सौंदर्य में नहीं बल्कि उन पहाड़ी लोगों में भी बसती है, जिन्होंने तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपनी मिट्टी, संस्कृति और परंपराओं को पीढ़ियों से सहेजकर रखा है। यदि पहाड़ में रोजगार और आजीविका के अवसर मजबूत हों वन्यजीवों से होने वाले नुकसान पर प्रभावी नियंत्रण की दिशा में काम हो और ग्रामीणों को सुरक्षित एवं सम्मानजनक जीवन मिले, तो पलायन जैसी गंभीर चुनौती को भी कम करने की राह तैयार हो सकती है। डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य की पहल इसी व्यापक सोच के साथ आगे बढ़ रही है जहां वन संरक्षण का अर्थ केवल पेड़ों और वन्यजीवों को बचाना नहीं, बल्कि उस पहाड़ी जीवन को भी सुरक्षित रखना है जो जंगलों, नदियों और प्रकृति के साथ सदियों से जुड़ा हुआ है। आखिरकार जंगल तभी सुरक्षित रहेंगे जब उनके आसपास रहने वाले लोगों के जीवन में भी खुशहाली होगी।

बागेश्वर की पहचान उसके घने जंगलों, हिमालय की बर्फीली चोटियों, कलकल बहती नदियों, निर्मल जलधाराओं और वन्यजीवों से समृद्ध प्राकृतिक संसार में बसती है। यहां की हरियाली, पहाड़ों से उतरती ठंडी हवाएं और नदियों का संगीत प्रकृति के उस अनमोल वैभव का एहसास कराते हैं जिसे शब्दों में पूरी तरह बयां करना आसान नहीं। इस प्राकृतिक सौंदर्य को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना तभी संभव है, जब जंगलों की हरियाली बरकरार रहे वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहें और पहाड़ के लोग भी प्रकृति के साथ खुशहाल जीवन जी सकें। क्योंकि बागेश्वर की असली खूबसूरती सिर्फ इसकी वादियों में नहीं बल्कि उन जंगलों, नदियों और पहाड़ी जीवन की धड़कनों में है जो इस धरती को स्वर्ग जैसा स्वरूप प्रदान करते हैं।